छत्तीसगढ़ राज्य के राजिम में दशहरा पर्व को लेकर एक अनूठी परंपरा है। यहां परंपरागत रूप से रावण का दहन नहीं किया जाता, बल्कि रावण का वध किया जाता है। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह समाज में अच्छाई की विजय और बुराई के नाश का संदेश भी देती है।
रावण वध की परंपरा
राजिम में दशहरा के दिन रावण के विशाल पुतले का दहन करने के बजाय, उसे वध किया जाता है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और यहां के लोग इसे बड़े श्रद्धा भाव से मनाते हैं। इस दिन रावण के पुतले के साथ-साथ उसके भाई कुम्भकर्ण और बेटे मेघनाथ के पुतलों का भी वध किया जाता है। यह आयोजन राजिम के प्रमुख घाटों पर होता है, जहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं।
पुष्प वर्षा का आयोजन
राजिम दशहरे की एक और विशेषता है पुष्प वर्षा। इस दिन रावण के वध के बाद आसमान से फूलों की वर्षा की जाती है, जो कि एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती है। श्रद्धालु इस अवसर पर एक-दूसरे पर फूलों की वर्षा करते हैं और बुराई के नाश की खुशी मनाते हैं।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
राजिम दशहरा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सांस्कृतिक दृष्टि से भी विशेष है। यह आयोजन यहां की लोक कला, संगीत और नृत्य का संगम है। इस दिन आयोजित होने वाली रामलीला, लोक नृत्य और संगीत कार्यक्रमों में स्थानीय कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। यह आयोजन यहां की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखने में भी सहायक है।
पर्यावरणीय पहल
राजिम में दशहरे के आयोजन में पर्यावरण का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। यहां रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता, जिससे वायु प्रदूषण नहीं होता। इसके अलावा, पुष्प वर्षा के लिए प्राकृतिक फूलों का उपयोग किया जाता है, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक नहीं होते। इस प्रकार, यह आयोजन पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
निष्कर्ष
राजिम दशहरा एक अद्वितीय सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन है, जो न केवल बुराई के नाश का प्रतीक है, बल्कि यह समाज में अच्छाई की विजय और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और भविष्य में भी इसे बनाए रखने की आवश्यकता है।
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