नई दिल्ली: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने गुजरात सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें 23 वर्षीय आरोपी रक्षित रवीश चौरसिया की जमानत रद्द करने की मांग की गई थी। राज्य सरकार का तर्क था कि नशे में धुत होकर गाड़ी चलाना और लोगों को कुचलना एक गंभीर सामाजिक खतरा है, लेकिन अदालत ने उच्च न्यायालय के नरम रुख का समर्थन किया।
अदालत में हुई तीखी बहस के मुख्य बिंदु:
सरकार की दलील (नशा और अहंकार): सरकारी वकील स्वाति घिल्डियाल ने चौंकाने वाला खुलासा किया कि हादसे के बाद आरोपी कार से निकला और चिल्लाया—"एक और राउंड, एक और राउंड।" उन्होंने तर्क दिया कि आरोपी नशे का आदी है और उस पर एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के तहत भी मामला दर्ज है।
धारा 105 (BNS) का पेच: सरकार का कहना था कि जब कोई व्यक्ति नशे में गाड़ी चलाता है, तो उसे पता होता है कि वह जान ले सकता है। इसलिए उस पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105 (गैर-इरादतन हत्या) लगनी चाहिए, जिसमें 10 साल तक की सजा है।
सुप्रीम कोर्ट का तर्क: पीठ ने कहा कि आरोपी पहले ही 9 महीने जेल में काट चुका है। अदालत ने माना कि यह कृत्य "जान-बूझकर" (Premeditated) नहीं किया गया था और आरोपी की कम उम्र (23 वर्ष) उसे सुधरने का एक मौका देने के लिए पर्याप्त आधार है।
अदालत की टिप्पणी: पीठ ने गुजरात सरकार की इस दलील से असहमति जताई कि नशा करना आरोपी के खिलाफ एक कठोर आधार होना चाहिए, बल्कि इसे एक "हादसे" के रूप में देखा।
हादसे की पृष्ठभूमि: 14 मार्च 2025
स्थान: वडोदरा शहर, गुजरात।
घटना: एक तेज रफ्तार कार ने कई दोपहिया वाहनों को रौंद दिया था।
हताहत: हेमाली पटेल नामक महिला की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि 9 अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
आरोपी: रक्षित चौरसिया, जिसे घटना के तुरंत बाद गिरफ्तार किया गया था।
निष्कर्ष:
यह फैसला भविष्य के 'ड्रंक एंड ड्राइव' (Drunk and Drive) मामलों के लिए एक नजीर बन सकता है। जहां पुलिस और सरकार सख्त सजा की मांग कर रहे हैं, वहीं न्यायपालिका 'सुधारात्मक न्याय' (Reformative Justice) और आरोपी की उम्र को प्राथमिकता दे रही है। हालांकि, पीड़ित परिवार के लिए यह कानूनी राहत एक बड़ा झटका है।
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