रायपुर/नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेश बघेल को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत नहीं मिली है। सर्वोच्च न्यायालय ने बघेल की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने 2023 के विधानसभा चुनाव में अपनी जीत को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज करने की मांग की थी। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि बघेल को चुनाव याचिका की ट्रायल (सुनवाई) के दौरान अपने सभी कानूनी और तथ्यात्मक आपत्तियां हाईकोर्ट में रखने की पूरी स्वतंत्रता है।

मामले की पृष्ठभूमि और आरोप यह मामला पाटन विधानसभा सीट से भूपेश बघेल के निर्वाचन को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका से जुड़ा है। भाजपा नेता और बघेल के चुनावी प्रतिद्वंद्वी विजय बघेल ने यह याचिका दायर की है। इसमें आरोप लगाया गया है कि मतदान से ठीक एक दिन पहले, 16 नवंबर 2023 को भूपेश बघेल ने एक रोड शो निकाला था। यह कदम जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के तहत लागू 48 घंटे के 'साइलेंस पीरियड' (मौन काल) का सीधा उल्लंघन माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल की दलील मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष हुई। भूपेश बघेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पैरवी करते हुए ठोस कानूनी अंतर बताया।

सिब्बल ने अदालत को बताया, "धारा 126 का उल्लंघन एक 'चुनावी अपराध' है, लेकिन यह 'भ्रष्ट आचरण' (Corrupt Practice) नहीं है। भ्रष्ट आचरण धारा 123 के तहत आता है।" उन्होंने तर्क दिया कि जब आरोप भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में ही नहीं आता, तो बघेल को पूरी चुनावी सुनवाई से गुजरने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कथित रोड शो में करीब 200 लोग शामिल थे और बघेल उस समय मुख्यमंत्री होने के नाते Z+ सुरक्षा घेरे में थे। सिब्बल ने यह भी बताया कि इस छोटी घटना का चुनाव परिणाम पर कोई असर नहीं पड़ सकता, क्योंकि भूपेश बघेल लगभग 20,000 मतों के भारी अंतर से विजयी हुए थे।

पीठ की टिप्पणी और फैसला सिब्बल की दलीलों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने न्यायिक पहलू को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कथित उल्लंघन से चुनाव परिणाम वास्तव में प्रभावित हुआ या नहीं, यह एक 'तथ्य का प्रश्न' (Question of Fact) है, जिसका निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति बागची ने हालांकि सिब्बल की दलीलों की सराहना करते हुए कहा, "आपके पास बचाव के लिए एक तर्कसंगत (plausible) मामला है।" इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने प्रारंभिक अवस्था में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और बघेल की याचिका खारिज कर दी।

आगे की कानूनी प्रक्रिया क्या होगी? सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद यह मामला फिर से छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में लौट गया है। अब हाईकोर्ट में इस चुनाव याचिका की पूरी सुनवाई होगी, जहां भूपेश बघेल कोर्ट द्वारा दी गई स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए अपने बचाव और तथ्यों को पूरी तरह से प्रस्तुत करेंगे।