देहरादून: "प्रकृति सर्वोपरि है और मानव अस्तित्व के लिए इसके साथ सह-अस्तित्व अनिवार्य है।" इस मूल मंत्र के साथ केंद्रीय मंत्री ने वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों को संबोधित किया।
संबोधन के 5 प्रमुख स्तंभ:
पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण: मंत्री ने कहा कि वन संरक्षण का अर्थ केवल वृक्षारोपण नहीं है। इसमें मिट्टी, जल स्रोत, वन्यजीव और जैव-विविधता का संपूर्ण संरक्षण शामिल है।
ग्रीन क्रेडिट और कार्बन मार्केट: वन संसाधनों को बनाए रखने के लिए ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम (GCP) और कार्बन क्रेडिट के महत्व पर प्रकाश डाला गया। यह उद्योगों को पर्यावरण के अनुकूल कार्यों के लिए प्रोत्साहित करने की एक आधुनिक आर्थिक व्यवस्था है।
जैव-अर्थव्यवस्था (Bio-economy): कार्यशाला में वन-आधारित उत्पादों के व्यावसायीकरण और नवाचार (Innovation) पर चर्चा हुई, ताकि वनों से स्थानीय आजीविका को सशक्त बनाया जा सके।
अंतर-विभागीय समन्वय: एक समग्र दृष्टिकोण के लिए विभिन्न सरकारी विभागों के बीच बेहतर तालमेल का आह्वान किया गया ताकि नीतिगत ढांचे को मजबूत किया जा सके।
तकनीकी सत्र: कार्यशाला में कृषि वानिकी (Agroforestry), गैर-लकड़ी वन उत्पाद, इंजीनियर लकड़ी उत्पाद और डिजिटल निगरानी जैसे भविष्यवादी विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ।
स्थानीय आजीविका और प्राकृतिक वन:
आधिकारिक बयान के अनुसार, सरकार का लक्ष्य ऐसे मूल्यवर्धित उत्पाद (Value-added products) बनाना है जिससे प्राकृतिक वनों पर दबाव कम हो और स्थानीय समुदायों की आय में वृद्धि हो। इसमें पर्यावरण पर्यटन (Eco-tourism) और डिजिटल निगरानी को मुख्य उपकरण माना गया है।
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