बेंगलुरु: दावणगेरे दक्षिण और बागलकोट सीटों पर 9 अप्रैल को होने वाले उपचुनाव कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बने हुए हैं, क्योंकि ये दोनों सीटें पार्टी के दिग्गज नेताओं के निधन से रिक्त हुई हैं।
उम्मीदवार चयन और आंतरिक चुनौतियां:
गुटबाजी और दबाव: दोनों सीटों के लिए कई इच्छुक उम्मीदवार और विभिन्न समुदायों के नेता अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। पार्टी नेतृत्व पर जल्द निर्णय लेने का भारी दबाव है ताकि प्रचार के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया: सुरजेवाला ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस किसी भी कार्यकर्ता की राय को नजरअंदाज नहीं करेगी। उन्होंने कहा, "हम व्यापक चर्चा में विश्वास रखते हैं, थोपे गए निर्णयों में नहीं।"
अंतिम मुहर: मुख्यमंत्री सिद्धरमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की सिफारिशों के बाद अंतिम फैसला कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी द्वारा लिया जाएगा।
किन सीटों पर हो रहे हैं उपचुनाव?
ये दोनों सीटें 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जीती थीं, लेकिन विधायकों के असामयिक निधन के कारण यहाँ फिर से मतदान हो रहा है:
| विधानसभा क्षेत्र | दिवंगत विधायक (कांग्रेस) | राजनीतिक महत्व |
| दावणगेरे दक्षिण | शमनूर शिवशंकरप्पा | लिंगायत समुदाय का गढ़ और कांग्रेस का मजबूत आधार। |
| बागलकोट | एच.वाई. मेटी | कुरुबा समुदाय और स्थानीय राजनीति में बड़ा प्रभाव। |
रणनीतिक महत्व:
इन उपचुनावों के परिणाम कर्नाटक में सिद्धरमैया सरकार के कामकाज पर 'जनता की मुहर' के रूप में देखे जाएंगे। पार्टी की कोशिश है कि सहानुभूति लहर (Sympathy Wave) के साथ-साथ मजबूत सांगठनिक पकड़ के जरिए इन दोनों किलों को बरकरार रखा जाए।
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