कोलकाता: पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान के लिए सुरक्षा बलों और चुनाव कर्मियों की आवाजाही पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। निजी बस संचालकों के सबसे बड़े निकाय, ‘जॉइंट काउंसिल ऑफ बस सिंडिकेट’ ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) को पत्र लिखकर चुनाव ड्यूटी के लिए ली जाने वाली बसों के किराए (Daily Hire Charges) में तत्काल वृद्धि की मांग की है।
विवाद की मुख्य वजहें:
अनदेखी का आरोप: सिंडिकेट के सचिव तपन बनर्जी ने आरोप लगाया कि आयोग के साथ दो दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अभी तक भुगतान की नई दरों को लेकर कोई आधिकारिक निर्णय साझा नहीं किया गया है।
लागत में वृद्धि: बस संचालकों का तर्क है कि ईंधन (Diesel) की कीमतों और रखरखाव के खर्च में भारी बढ़ोतरी हुई है, जबकि चुनाव ड्यूटी की पुरानी दरें अब व्यावहारिक नहीं रह गई हैं।
प्रशासनिक दबाव: केंद्रीय बल (Central Forces) पहले ही बंगाल पहुँच चुके हैं और प्रशासन ने उनकी आवाजाही के लिए निजी बसों को अपने नियंत्रण (Requisition) में लेना शुरू कर दिया है, जिससे संचालक असमंजस में हैं।
प्रमुख मांगें:
तत्काल दर संशोधन: बसों और मिनीबसों के प्रतिदिन के किराए में सम्मानजनक वृद्धि।
समयबद्ध भुगतान: चुनाव ड्यूटी खत्म होने के तुरंत बाद बकाया राशि का निपटान।
ईंधन भत्ता: लंबी दूरी की यात्रा के लिए अतिरिक्त तेल और लुब्रिकेंट्स का प्रावधान।
चुनावी तैयारियों पर असर:
पश्चिम बंगाल में चुनाव कराने के लिए हजारों निजी बसों और मिनीबसों की आवश्यकता होती है। यदि बस संचालक सहयोग नहीं करते हैं, तो सुरक्षा बलों की तैनाती और पोलिंग पार्टियों का बूथों तक पहुँचना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
"चुनाव की तारीखें सिर पर हैं और प्रशासन ने बसें जब्त करना शुरू कर दिया है, लेकिन हमें अभी तक यह नहीं बताया गया कि हमें कितना भुगतान मिलेगा। आयोग की यह चुप्पी बस मालिकों के लिए चिंताजनक है।" — तपन बनर्जी, सचिव, जॉइंट काउंसिल ऑफ बस सिंडिकेट
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