नयी दिल्ली: बुधवार को उच्च सदन में एक भावुक और वैचारिक माहौल के बीच मल्लिकार्जुन खरगे ने अपना वक्तव्य रखा। खुद सेवानिवृत्त हो रहे (लेकिन अगले कार्यकाल के लिए तैयार) खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में संसदीय संस्थाओं को कमजोर होने से बचाने की चेतावनी दी।

प्रमुख सिफारिशें और विचार:

  • संसदीय नियमों की समीक्षा: खरगे ने पुरजोर वकालत की कि राज्यसभा के संचालन नियमों की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए। उन्होंने जानकारी दी कि यह मामला फिलहाल सामान्य प्रयोजन समिति (GPC) के पास विचाराधीन है।

  • बैठकों की संख्या में वृद्धि: उन्होंने चिंता जताई कि सदन की बैठकें कम हो रही हैं। लोक महत्व के मुद्दों, विशेषकर गरीबों, किसानों और श्रमिकों के हितों पर विस्तृत चर्चा के लिए सदन को अधिक दिनों तक चलना चाहिए।

  • विपक्ष की भागीदारी: खरगे ने कहा कि विधेयक (Bills) तैयार करने में केवल सत्ता पक्ष नहीं, बल्कि विपक्षी सांसदों की भी सक्रिय भूमिका होनी चाहिए। यदि विपक्ष की आवाज को बाधित किया जाता है, तो इससे संसद की संस्थागत शक्ति क्षीण होती है।

  • कार्यवाही से शब्द हटाने पर आपत्ति: उन्होंने एक गंभीर मुद्दा उठाया कि अक्सर सांसदों के तर्कसंगत और संसदीय शब्दों को भी रिकॉर्ड से हटा दिया जाता है, जिससे उनके वक्तव्य का मूल अर्थ ही बदल जाता है।

राजनीति और सेवा पर प्रेरक विचार:

"राजनीति में लोग कभी सार्वजनिक जीवन से सेवानिवृत्त नहीं होते और न ही देश सेवा के उत्साह में कभी थकते हैं। चेहरे बदलते रहते हैं, लेकिन संस्थाएं स्थायी रहती हैं।"

संसदीय लोकतंत्र के लिए संदेश:

  1. अभिव्यक्ति की आजादी: संविधान हर सदस्य को निडर होकर बोलने का अधिकार देता है। यदि चर्चा और विमर्श (Debate and Deliberation) सीमित होगा, तो लोकतंत्र का वास्तविक महत्व समाप्त हो जाएगा।

  2. आलोचना बनाम सुझाव: उन्होंने सत्ता पक्ष से आग्रह किया कि विपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों को केवल 'आलोचना' न समझकर 'जनता की चिंता' के रूप में देखा जाना चाहिए।

  3. अनुभव का मूल्य: उन्होंने विश्वास जताया कि सेवानिवृत्त हो रहे सदस्यों का अनुभव भविष्य में राष्ट्र निर्माण में और भी बड़ी भूमिका निभाएगा।

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