नयी दिल्ली/लखनऊ (3 अप्रैल 2026): भारत के कृषि क्षेत्र में रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने के लिए शुरू किया गया 'नैनो फर्टिलाइजर' मिशन सफल होता दिख रहा है। इफ्को (IFFCO) की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक साल में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के उपयोग में 40% की वृद्धि हुई है, जिससे खाद सब्सिडी का बोझ भी कम हुआ है।
मुख्य बिंदु और विस्तृत विश्लेषण:
लागत में कमी: एक बोरी पारंपरिक खाद (लगभग 50 किलो) की जगह अब केवल 500 मिलीलीटर की एक नैनो बोतल काम कर रही है। इससे किसानों की परिवहन लागत में भारी कमी आई है और भंडारण भी आसान हुआ है।
पर्यावरण के अनुकूल: पारंपरिक खाद का बड़ा हिस्सा मिट्टी और भूजल को प्रदूषित करता है, जबकि नैनो खाद सीधे पौधों के पत्तों द्वारा सोख ली जाती है। इससे मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता बनी रहती है।
बढ़ी हुई पैदावार: उत्तर प्रदेश और पंजाब के ट्रायल डेटा से पता चला है कि नैनो खाद के उपयोग से गेहूं और धान की पैदावार में 8-10% की बढ़ोतरी हुई है।
निर्यात की संभावनाएं: भारत अब नैनो उर्वरक तकनीक का अग्रणी निर्यातक बन गया है। श्रीलंका, ब्राजील और कई अफ्रीकी देश भारत से यह तकनीक आयात कर रहे हैं।
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