नयी दिल्ली (2 अप्रैल 2026): मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय की अध्यक्षता वाली पीठ ने वकीलों के बीच हुए हिंसक टकराव पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए दायर याचिका का निपटारा करते हुए यह सुरक्षा दिशानिर्देश जारी किए।
1. दिल्ली पुलिस को कड़े निर्देश:
नियमित समीक्षा: कोर्ट ने आदेश दिया कि दिल्ली पुलिस प्रत्येक जिला न्यायालय में लागू सुरक्षा व्यवस्था को न केवल जारी रखे, बल्कि संबंधित प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के साथ परामर्श कर समय-समय पर इसकी समीक्षा भी करे।
पर्याप्त बल: पुलिस ने अदालत को आश्वस्त किया है कि सभी कोर्ट परिसरों में पर्याप्त पुलिस बल तैनात है और सुरक्षा व्यवस्था की कड़ाई से निगरानी की जा रही है।
2. घटना की पृष्ठभूमि (तीस हजारी विवाद):
यह पूरा मामला 7 फरवरी 2024 को तीस हजारी कोर्ट में हुई एक शर्मनाक घटना से शुरू हुआ था:
हिंसक हमला: एक अदालत कक्ष के भीतर बहस के दौरान दो प्रतिद्वंद्वी वकीलों में विवाद हुआ। आरोप है कि एक वकील ने दरवाजा अंदर से बंद कर दूसरे वकील की बेरहमी से पिटाई की और अभद्र भाषा का प्रयोग किया।
कोर्ट का संज्ञान: 9 फरवरी को हाई कोर्ट ने इस घटना पर गहरी चिंता जताते हुए स्वतः संज्ञान लिया था और पुलिस से विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी।
3. जांच की वर्तमान स्थिति:
आरोपपत्र (Charge Sheet): दिल्ली पुलिस के वकील ने पीठ को सूचित किया कि घटना से संबंधित प्राथमिकी (FIR) की जांच पूरी हो चुकी है। अब जल्द ही संबंधित निचली अदालत में अंतिम रिपोर्ट या चार्जशीट दाखिल कर दी जाएगी।
सुरक्षा ऑडिट: पुलिस द्वारा यह भी बताया गया कि अदालतों में प्रवेश द्वारों पर तलाशी और सुरक्षा उपकरणों की नियमित जांच की जा रही है।
4. कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी:
पीठ ने कहा कि चूंकि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जा चुके हैं और जांच अंतिम चरण में है, इसलिए इस मामले को लंबित रखने का अब कोई औचित्य नहीं है। कोर्ट ने प्रशासन को भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सतर्क रहने को कहा।
निष्कर्ष:
अदालतों के भीतर हिंसा की बढ़ती घटनाओं के बीच दिल्ली हाई कोर्ट का यह आदेश न्यायिक परिसरों को 'सुरक्षित क्षेत्र' (Safe Zones) बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह सुनिश्चित करना अब पुलिस और जिला न्यायाधीशों की संयुक्त जिम्मेदारी होगी कि कानून के मंदिर में कानून की रक्षा करने वाले ही असुरक्षित न हों।
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