सुकमा से दंतेवाड़ा तक बदला बस्तर का मंजर: जहां कभी बारूद की गंध थी, वहां अब विकास की दस्तक; कलेक्टरों ने बाइक से नापा दुर्गम रास्ता

सुकमा से दंतेवाड़ा तक बदला बस्तर का मंजर: जहां कभी बारूद की गंध थी, वहां अब विकास की दस्तक; कलेक्टरों ने बाइक से नापा दुर्गम रास्ता

12, 2, 2026

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सुकमा/दंतेवाड़ा: बस्तर के उन जंगलों में, जहां कभी परिंदा भी पर मारने से पहले माओवादियों की इजाजत लेता था, अब लोकतंत्र की ताजी हवा बह रही है। दक्षिण बस्तर के सुकमा और दंतेवाड़ा जिलों के उन 'नो-गो ज़ोन्स' में अब प्रशासनिक अमला न केवल पहुँच रहा है, बल्कि ग्रामीणों के साथ जमीन पर बैठकर उनकी बुनियादी समस्याओं का समाधान भी कर रहा है।

पापाराव के गढ़ में 'विकास की जन-अदालत'

यह बदलाव कितना बड़ा है, इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। साल 2012 में सुकमा मुख्यालय से मात्र 20 किमी दूर तत्कालीन कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन का अपहरण कर लिया गया था। लेकिन आज, मुख्यालय से 90 किमी दूर धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र और शीर्ष माओवादी नेता पापाराव के पैतृक गांव नीलामड़गू में सुकमा कलेक्टर अमित कुमार और एसपी किरण चव्हाण बिना किसी डर के ग्रामीणों के बीच मौजूद हैं।

  • अतीत का खौफ: नीलामड़गू के बुजुर्ग विज्जा बताते हैं, "पहले यहाँ दिनदहाड़े बंदूकधारी माओवादी आते थे और डराकर फैसले सुनाते थे। आज अधिकारी हमारे बीच बैठकर हमारी मांगें सुन रहे हैं।"

बंदूक की जगह शिक्षा और लोकतंत्र की बात

कोंटा विकासखंड के कई गांव चार दशकों तक हिंसा की भेंट चढ़े रहे। आदिवासी युवा रामेश्वर कहते हैं, "पहले यहाँ माओवादियों के 'स्कूल' चलते थे, जहाँ सिर्फ नफरत और बंदूक पकड़ना सिखाया जाता था। अब सरकार स्कूल खोल रही है, जहाँ पढ़ाई होती है। अब हमें सड़क और नौकरियों की जानकारी मिल रही है।"

प्रशासन की प्राथमिकता: कलेक्टर अमित कुमार के अनुसार, सुरक्षा कैंपों की स्थापना के बाद पहला लक्ष्य ग्रामीणों का भरोसा जीतना था। सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा को प्राथमिकता देकर विकास को सीधे गांव की चौखट तक पहुँचाया जा रहा है।

दंतेवाड़ा: बाइक पर सवार कलेक्टर और पुरंगेल की नई उम्मीद

बदलाव की ऐसी ही तस्वीर दंतेवाड़ा के पुरंगेल गांव में देखने को मिली। दुर्गम रास्ता और भौगोलिक चुनौतियों के कारण कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव खुद बाइक चलाकर इस सुदूर गांव तक पहुँचे।

  • जमीनी निर्देश: कलेक्टर ने मौके पर ही 'प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना' के तहत पुरंगेल तक पक्की सड़क के लिए प्राक्कलन (Estimate) तैयार करने के निर्देश दिए।

  • आजीविका पर जोर: ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें बकरी और सूअर पालन जैसी योजनाओं से जोड़ने तथा पेयजल के लिए नए कुएं और हैंडपंप की व्यवस्था करने का भरोसा दिलाया।

निष्कर्ष: ढहता माओवाद और उभरता बस्तर

बसों का संचालन शुरू होना और सरकारी गाड़ियों का इन जंगलों के भीतर तक पहुँचना इस बात का प्रमाण है कि बस्तर में माओवाद का किला ढह रहा है। जहाँ कभी 'जन अदालत' में मौत के फरमान सुनाए जाते थे, आज वहाँ विकास कार्यों की फाइलें खुल रही हैं।


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