शह मात: पोटा केबिन कांड पर सदन में 'महाभारत'; विपक्ष का वॉकआउट, सरकार का 'क्लीन चिट' वाला तर्क और उठते सुलगते सवाल

शह मात: पोटा केबिन कांड पर सदन में 'महाभारत'; विपक्ष का वॉकआउट, सरकार का 'क्लीन चिट' वाला तर्क और उठते सुलगते सवाल

12, 2, 2026

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रायपुर: छत्तीसगढ़ विधानसभा का बजट सत्र उस वक्त अखाड़े में तब्दील हो गया जब विपक्ष ने बीजापुर के गंगालूर पोटा केबिन में तीन नाबालिग छात्राओं के गर्भवती होने का मुद्दा शून्यकाल में उठाया। इस संवेदनशील मुद्दे पर 'शह मात' का खेल तब शुरू हुआ जब विपक्ष के 'स्थगन प्रस्ताव' को आसंदी ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद सदन से लेकर सड़क तक आरोपों की बौछार शुरू हो गई है।

विपक्ष का प्रहार: "लीपापोती कर रही है सरकार"

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पीसीसी चीफ दीपक बैज ने सरकार की घेराबंदी करते हुए इसे व्यवस्था की विफलता बताया:

  • भूपेश बघेल का आरोप: पूर्व सीएम ने सीधे तौर पर कहा कि भाजपा सरकार दोषियों को सजा देने के बजाय मामले को रफा-दफा (लीपापोती) करने में जुटी है।

  • दीपक बैज की चेतावनी: प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने ऐलान किया कि कांग्रेस इस मुद्दे पर जल्द ही एक उच्च स्तरीय 'जांच कमेटी' बनाएगी और सरकार के खिलाफ प्रदेश व्यापी बड़ा प्रदर्शन करेगी।

  • सदन में हंगामा: चर्चा की अनुमति न मिलने पर विपक्षी सदस्यों ने जमकर नारेबाजी की और सदन से वॉकआउट कर दिया।

सरकार का बचाव: शिक्षा मंत्री का 'परिजन' वाला तर्क

विपक्ष के तीखे हमलों का जवाब देते हुए शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने सरकार का पक्ष रखा:

  • लिखित स्पष्टीकरण: मंत्री ने दावा किया कि छात्राओं और उनके परिजनों ने लिखित में जानकारी दी है कि यह घटना पोटा केबिन के भीतर या सरकारी संरक्षण में नहीं हुई है।

  • निजी दौरा: शिक्षा मंत्री ने कहा कि वे स्वयं मौके पर जाकर स्थिति का निरीक्षण करेंगे और सच्चाई का पता लगाएंगे।


'शह मात' विश्लेषण: वे 5 सवाल जो जवाब मांग रहे हैं

भले ही सरकार इसे 'घर की बात' बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश करे, लेकिन 'शह मात' की इस डिबेट में कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब मिलना बाकी है:

  1. प्रबंधन की चुप्पी क्यों?: अगर छात्राएं पढ़ाई के बीच गर्भवती हुईं, तो हॉस्टल प्रबंधन और वार्डन को इसकी भनक 5 महीने तक क्यों नहीं लगी?

  2. रिपोर्टिंग में देरी: अगर छात्राएं घर गई थीं और वहां कुछ हुआ, तो स्कूल लौटने पर उनकी अनिवार्य स्वास्थ्य जांच क्यों नहीं हुई? मामले को तुरंत रिपोर्ट क्यों नहीं किया गया?

  3. सिस्टम की विफलता: क्या पोटा केबिन जैसे संवेदनशील संस्थानों में छात्राओं की सुरक्षा केवल कागजों पर है?

  4. स्वास्थ्य कार्ड का रहस्य: स्वास्थ्य विभाग ने 'गर्भवती कार्ड' बना दिए, लेकिन शिक्षा विभाग 'अंधेरे' में कैसे रहा?

  5. नैतिक जिम्मेदारी: क्या सरकार और विभाग की जिम्मेदारी केवल तब तक है जब छात्राएं कैंपस के अंदर हों? क्या उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा की मॉनिटरिंग में इतनी बड़ी चूक के लिए किसी की जवाबदेही तय होगी?

निष्कर्ष

पोटा केबिन मामले ने एक बार फिर वनांचल क्षेत्रों में संचालित आवासीय विद्यालयों की सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। "शह मात" की इस राजनीति के बीच असली सवाल उन तीन नाबालिग बेटियों के भविष्य और सुरक्षा का है, जो अब व्यवस्था की फाइलों और सियासी बयानों के बीच कहीं खो गया है।

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