छत्तीसगढ़ कांग्रेस की 'आदिवासी वापसी' रणनीति: दिल्ली में खरगे-राहुल के साथ बैठक; बस्तर-सरगुजा फतह के लिए पेसा और वन अधिकार बनेगा बड़ा मुद्दा

छत्तीसगढ़ कांग्रेस की 'आदिवासी वापसी' रणनीति: दिल्ली में खरगे-राहुल के साथ बैठक; बस्तर-सरगुजा फतह के लिए पेसा और वन अधिकार बनेगा बड़ा मुद्दा

12, 2, 2026

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रायपुर/दिल्ली (18 मार्च 2026): कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी की मौजूदगी में हुई इस बैठक में छत्तीसगढ़ पीसीसी चीफ दीपक बैज और आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया सहित प्रदेश के प्रमुख आदिवासी विधायक शामिल हुए।

1. कांग्रेस का नया 'एक्शन प्लान'

बैठक में तय किया गया कि कांग्रेस देशभर में, विशेषकर छत्तीसगढ़ में, निम्नलिखित मुद्दों पर आदिवासियों को लामबंद करेगी:

  • PESA कानून का प्रभावी कार्यान्वयन: ग्राम सभाओं के अधिकारों और उनकी स्वायत्तता को प्रमुखता देना।

  • जल-जंगल-जमीन: खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण होने वाली बेदखली के खिलाफ आवाज उठाना।

  • वन अधिकार अधिनियम (FRA): पट्टों के वितरण में देरी और निरस्त दावों को मुद्दा बनाना।

  • नक्सलवाद और विकास: बस्तर में सुरक्षा बलों की कार्रवाई और आदिवासियों के बीच उपजे कथित अविश्वास को राजनीतिक रूप से भुनाना।

2. बस्तर और सरगुजा का गणित: क्यों डरी है कांग्रेस?

आंकड़े बताते हैं कि आदिवासियों का साथ छूटना कांग्रेस की हार की सबसे बड़ी वजह रहा है:

  • सरगुजा (09 ST सीटें): 2018 में कांग्रेस ने यहाँ क्लीन स्वीप किया था, लेकिन 2023 में भाजपा ने यहाँ कांग्रेस का पूरी तरह सफाया कर दिया।

  • बस्तर (11 ST सीटें): बस्तर में भी कांग्रेस को भारी नुकसान झेलना पड़ा।

  • 2026 की चुनौती: नक्सलियों के खिलाफ जारी प्रभावी सैन्य ऑपरेशनों (सर्जिकल स्ट्राइक और आत्मसमर्पण) का श्रेय वर्तमान भाजपा सरकार को मिल रहा है, जिससे कांग्रेस को डर है कि उसका वोट बैंक और अधिक खिसक सकता है।

3. भाजपा का तीखा प्रहार: "कांग्रेस के अपने ही 3-4 गुट"

भाजपा ने इस बैठक को केवल एक 'दिखावा' करार दिया है। पूर्व मंत्री और भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने तंज कसते हुए कहा:

"कांग्रेस छत्तीसगढ़ में गुटबाजी से जूझ रही है। दिल्ली में केवल एक 'खास' गुट को बुलाया गया है। आदिवासी अब कांग्रेस के झूठे वादों और धर्मांतरण जैसे मुद्दों को समझ चुके हैं और उनका साथ छोड़ चुके हैं।"


निष्कर्ष: साख बचाने की लड़ाई

छत्तीसगढ़ में 32% आदिवासी आबादी और 29 आरक्षित सीटों के बिना सत्ता की राह नामुमकिन है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह 'पेसा' जैसे तकनीकी मुद्दों को धरातल पर आदिवासियों की भावनाओं से कैसे जोड़ पाती है। वहीं, भाजपा अपने 'महतारी वंदन' और नक्सल मुक्त बस्तर के नैरेटिव के साथ अपनी पकड़ मजबूत कर रही है।

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