छत्तीसगढ़ विधानसभा में 'धर्म स्वातंत्र्य बिल' पेश: कांग्रेस ने किया जोरदार विरोध; डॉ. चरणदास महंत ने प्रवर समिति को भेजने की उठाई मांग
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छत्तीसगढ़ विधानसभा में 'धर्म स्वातंत्र्य बिल' पेश: कांग्रेस ने किया जोरदार विरोध; डॉ. चरणदास महंत ने प्रवर समिति को भेजने की उठाई मांग

12, 2, 2026

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रायपुर (19 मार्च 2026): गुरुवार को विधानसभा की कार्यवाही के दौरान गृहमंत्री विजय शर्मा ने जैसे ही संशोधन विधेयक पेश किया, विपक्ष ने एकजुट होकर इसका विरोध शुरू कर दिया।

1. कांग्रेस का पक्ष: "जल्दबाजी में न हो फैसला"

नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने इस विधेयक को प्रवर समिति (Select Committee) के पास भेजने का प्रस्ताव रखा। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित थे:

  • देशव्यापी स्थिति: डॉ. महंत ने कहा कि देश के 11 राज्यों में इसी तरह के विधेयक अभी लंबित हैं और उन पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

  • गहन समीक्षा की जरूरत: विपक्ष का मानना है कि इस संवेदनशील कानून के हर पहलू पर चर्चा के लिए इसे विधानसभा की विशेष समिति को सौंपा जाना चाहिए।

2. शून्यकाल में SIR और 'लापता नागरिकों' पर हंगामा

विधेयक से इतर, विपक्ष ने SIR (State Intelligence Report) और प्रदेश से लापता लोगों के मुद्दे पर स्थगन प्रस्ताव लाकर सरकार को घेरा:

  • 19 लाख लापता: डॉ. महंत ने चौंकाने वाला दावा किया कि प्रदेश से 19 लाख से ज्यादा लोग लापता हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से काट दिए गए हैं।

  • सलवा जुडूम का मुद्दा: उन्होंने आरोप लगाया कि बस्तर में सलवा जुडूम के दौरान करीब 1 लाख लोग लापता हुए, जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।


3. छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य संशोधन विधेयक 2026 (एक नजर में)

यह कानून राज्य में छल-कपट या प्रलोभन के जरिए होने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए बनाया गया है।

प्रावधानविवरण
प्रतिबंधबल, लालच, दबाव, धोखा या डिजिटल माध्यम से धर्मांतरण।
सूचना प्रक्रियास्वेच्छा से धर्म बदलने के लिए जिला मजिस्ट्रेट (DM) को पूर्व सूचना देना अनिवार्य।
सामान्य सजा7 से 10 वर्ष की जेल।
विशेष वर्ग (महिला/नाबालिग/SC/ST)10 से 20 वर्ष तक का कठोर कारावास।
सामूहिक धर्मांतरणआजीवन कारावास तक की सजा।
कानूनी प्रकृतिअपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होगा।

निष्कर्ष: आगे क्या?

विपक्ष के भारी हंगामे और बहिर्गमन के बावजूद, सरकार अपनी बहुमत के बल पर इस बिल को पारित कराने की दिशा में आगे बढ़ रही है। गृहमंत्री विजय शर्मा ने स्पष्ट किया है कि "धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए यह कानून समय की मांग है।"

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