ISIS-JK से संबंध के आरोपी 2 कश्मीरी युवक बरी; दिल्ली कोर्ट ने कहा- "पुलिस आरोपों को साबित करने में रही नाकाम, जांच में थीं भारी खामियां"

ISIS-JK से संबंध के आरोपी 2 कश्मीरी युवक बरी; दिल्ली कोर्ट ने कहा- "पुलिस आरोपों को साबित करने में रही नाकाम, जांच में थीं भारी खामियां"

12, 2, 2026

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नयी दिल्ली। दिल्ली की एक विशेष अदालत ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन ISIS के प्रति वफादारी दिखाने और हथियारों की तस्करी के आरोपी दो कश्मीरी युवकों को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमित बंसल ने अपने 79 पन्नों के विस्तृत आदेश में दिल्ली पुलिस की जांच में गंभीर खामियों को रेखांकित करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ 'संदेह से परे' सबूत पेश करने में विफल रहा।

क्या था मामला और पुलिस का दावा?

सितंबर 2018 में दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ (Special Cell) ने कश्मीर के शोपियां निवासी जमशेद जहूर पॉल और परवेज राशिद लोन को लाल किले के पास जामा मस्जिद बस स्टॉप से गिरफ्तार किया था। पुलिस का दावा था कि:

  • दोनों आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट जम्मू-कश्मीर (ISIS-JK) के सदस्य हैं।

  • वे उत्तर प्रदेश से हथियार और गोला-बारूद खरीदकर दिल्ली के रास्ते कश्मीर ले जाने वाले थे।

  • उनके पास से दो 7.65 एमएम की पिस्तौल और 10 कारतूस बरामद किए गए थे।

  • आरोपियों पर UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) की धारा 18 (साजिश) और 20 (आतंकवादी संगठन का सदस्य होना) के तहत केस दर्ज किया गया था।

कोर्ट ने क्यों किया बरी? (अदालत की मुख्य टिप्पणियां)

अदालत ने पुलिस की थ्योरी को खारिज करते हुए कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जांच की कमियों को उजागर किया:

  1. डिजिटल साक्ष्यों का अभाव: पुलिस ने दावा किया था कि आरोपी BlackBerry Messenger (BBM) और WhatsApp के जरिए अपने आकाओं के संपर्क में थे। कोर्ट ने पाया कि पुलिस यह साबित नहीं कर सकी कि इन डिजिटल माध्यमों से कोई आतंकी साजिश रची गई थी।

  2. संगठन की सदस्यता सिद्ध नहीं: अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि 6 सितंबर 2018 (गिरफ्तारी) से पहले की अवधि में भी ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि दोनों युवक ISIS के सक्रिय सदस्य थे।

  3. हथियारों की संदिग्ध बरामदगी: कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि बरामद हथियार किसी आतंकी साजिश का हिस्सा थे या उन्हें किसी विशेष उद्देश्य से एकत्र किया गया था।

जांच एजेंसियों के लिए बड़ा सबक

यह फैसला एक बार फिर उस बहस को जन्म देता है जहाँ आतंकवाद के मामलों में केवल 'खुफिया जानकारी' या 'संदेह' के आधार पर की गई लंबी कानूनी कार्रवाई कोर्ट में टिक नहीं पाती। 2018 से जेल में बंद इन युवकों के संदर्भ में अदालत का यह आदेश सुरक्षा एजेंसियों के लिए अपनी चार्जशीट को और अधिक पुख्ता बनाने की चेतावनी है।

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