लोकतंत्र पर मंथन: "भारत अभी निरंकुश नहीं, पर असहमति को अवैध ठहराना चिंताजनक" — शशि थरूर; योगेंद्र यादव ने दी 'गणतंत्र के विघटन' की चेतावनी

लोकतंत्र पर मंथन: "भारत अभी निरंकुश नहीं, पर असहमति को अवैध ठहराना चिंताजनक" — शशि थरूर; योगेंद्र यादव ने दी 'गणतंत्र के विघटन' की चेतावनी

12, 2, 2026

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नयी दिल्ली। भारत में लोकतंत्र की सेहत और असहमति की जगह को लेकर राजधानी में एक महत्वपूर्ण विमर्श हुआ। पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्वनी कुमार की नई पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में कांग्रेस नेता शशि थरूर और स्वराज इंडिया के संस्थापक योगेंद्र यादव ने देश की राजनीतिक दिशा पर गहरे सवाल उठाए। जहाँ थरूर ने भारतीय लोकतंत्र से उम्मीद न छोड़ने की बात कही, वहीं यादव ने इसे सामान्य गिरावट से कहीं अधिक 'विघटन' का दौर करार दिया।

शशि थरूर: "उम्मीद अभी बाकी है, पर चेतावनी भी"

पूर्व राजनयिक और सांसद शशि थरूर ने संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि भारत अभी पूरी तरह से निरंकुश व्यवस्था (Autocracy) में तब्दील नहीं हुआ है। उनके संबोधन के मुख्य बिंदु:

  • बोलने की आजादी: थरूर ने कहा कि "यह तथ्य कि हम आज भी सार्वजनिक रूप से आलोचना और बहस कर सकते हैं, यह दर्शाता है कि भारत अभी निरंकुश नहीं बना है।"

  • असहमति का अपराधीकरण: उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि विरोध की आवाजों को "अवैध" या "राष्ट्रविरोधी" ठहराने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है, जो लोकतंत्र के लिए घातक है।

  • संसद की गरिमा: उन्होंने संसदीय कार्यवाही में बार-बार होने वाले व्यवधान और स्थगन पर दुख जताया। थरूर ने अपील की कि संसद का उपयोग 'हंगामे' के बजाय 'तर्कपूर्ण बहस' और विधायी कार्यों के लिए होना चाहिए।

योगेंद्र यादव: "यह लोकतंत्र का पतन नहीं, गणतंत्र का विघटन है"

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव का रुख अधिक कड़ा और चेतावनी भरा रहा। उन्होंने कहा:

  1. गहरा संकट: यादव के अनुसार, भारत में जो हो रहा है वह केवल लोकतांत्रिक मूल्यों में गिरावट नहीं है, बल्कि यह "गणतंत्र का और भी गहरा विघटन" है।

  2. संस्थागत क्षरण: उन्होंने संकेत दिया कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे की बुनियाद कमजोर हो रही है, जिसे केवल चुनावी हार-जीत के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

पुस्तक "गार्जियंस ऑफ द रिपब्लिक" का संदर्भ

पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्वनी कुमार की यह पुस्तक गणतंत्र के रक्षकों और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर केंद्रित है। कार्यक्रम में मौजूद वक्ताओं ने जोर दिया कि गणतंत्र की रक्षा केवल राजनेताओं का काम नहीं है, बल्कि इसमें न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज की भी समान जिम्मेदारी है।

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