'एक आरोपी पुलिस सुरक्षा कैसे मांग सकता है?': कोटद्वार प्रकरण में 'मोहम्मद दीपक' को हाईकोर्ट की फटकार; जांच को प्रभावित करने की कोशिश करार

'एक आरोपी पुलिस सुरक्षा कैसे मांग सकता है?': कोटद्वार प्रकरण में 'मोहम्मद दीपक' को हाईकोर्ट की फटकार; जांच को प्रभावित करने की कोशिश करार

12, 2, 2026

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नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कोटद्वार की विवादास्पद घटना के मुख्य पात्र और जिम मालिक दीपक कुमार (जो खुद को 'मोहम्मद दीपक' बताते हैं) को कड़ी फटकार लगाई है। न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने प्राथमिकी रद्द करने की याचिका में पुलिस सुरक्षा और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई जैसी मांगें शामिल करने पर सख्त आपत्ति जताई। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में पूछा कि जो व्यक्ति खुद एक 'संदिग्ध आरोपी' है, वह पुलिस सुरक्षा का हकदार कैसे हो सकता है?

अदालत की मुख्य टिप्पणियां: "दबाव बनाने की रणनीति"

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति थपलियाल ने याचिका के स्वरूप और उसमें किए गए अनुरोधों पर कई गंभीर सवाल खड़े किए:

  • जांच पर दबाव: पीठ ने याचिका को "दबाव बनाने की रणनीति" करार दिया, जिसका उद्देश्य जारी जांच को प्रभावित करना और मामले को सनसनीखेज बनाना है।

  • अनावश्यक मांगें: कोर्ट ने कहा कि एक आरोपी द्वारा पुलिस सुरक्षा मांगना और बिना सबूतों के पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की मांग करना पूरी तरह अनुचित है।

  • संदिग्ध का दर्जा: अदालत ने टिप्पणी की, "आज की तारीख में याचिकाकर्ता एक संदिग्ध आरोपी है। जो व्यक्ति खुद जांच के दायरे में है, उसे पुलिस सुरक्षा कैसे मिल सकती है?"

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद 26 जनवरी को कोटद्वार में शुरू हुआ था:

  1. विवाद की जड़: कोटद्वार में एक मुस्लिम दुकानदार (वकील अहमद) द्वारा अपनी दुकान का नाम 'बाबा' रखे जाने पर बजरंग दल के सदस्यों ने आपत्ति जताई थी।

  2. झगड़ा और वीडियो: इस दौरान जिम मालिक दीपक कुमार का बजरंग दल के सदस्यों के साथ झगड़ा हुआ। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसमें दीपक ने खुद को 'मोहम्मद दीपक' बताया था।

  3. दर्ज मामले: दीपक कुमार के खिलाफ दंगा करने, मारपीट और शांति भंग करने के इरादे से अपमानित करने की धाराओं में मामला दर्ज किया गया है।

फंडिंग पर भी हुई पूछताछ

सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने एक और चौंकाने वाले पहलू पर संज्ञान लिया। अदालत ने घटना के बाद दीपक को समर्थकों से मिली आर्थिक मदद के बारे में पूछताछ की। दीपक ने स्वीकार किया कि उन्हें दान के रूप में लगभग 80,000 रुपये प्राप्त हुए थे, जिसके बाद उन्होंने अपने बैंक खाते की गतिविधियों को बंद कर दिया था।

अगली कार्रवाई

अदालत के संज्ञान में लाया गया कि याचिकाकर्ता की शिकायत पर भी दो प्राथमिकियां दर्ज की गई थीं। अदालत ने निर्देश दिया है कि यदि ऐसी कोई शिकायत है, तो उसे शुक्रवार को अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। फिलहाल, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि जांच के इस स्तर पर किसी भी प्रकार का 'संरक्षण' देना अनावश्यक है।

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