सुप्रीम कोर्ट से 'वनतारा' को मिली क्लीन चिट: अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के उल्लंघन वाली नई याचिका खारिज; कोर्ट बोला- "पहले ही हो चुका है फैसला"

सुप्रीम कोर्ट से 'वनतारा' को मिली क्लीन चिट: अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के उल्लंघन वाली नई याचिका खारिज; कोर्ट बोला- "पहले ही हो चुका है फैसला"

12, 2, 2026

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नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस समर्थित 'वनतारा' (Vantara) प्राणी संरक्षण एवं पुनर्वास केंद्र के खिलाफ दायर एक और जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर अदालत पिछले साल ही अपना रुख साफ कर चुकी है और बार-बार एक ही विषय पर याचिकाएं लाना उचित नहीं है।

क्या थी याचिका और मांग?

'करणार्थम विरामह फाउंडेशन' द्वारा दायर इस याचिका में केंद्र सरकार और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) को निम्नलिखित निर्देश देने की मांग की गई थी:

  • दस्तावेजों की जांच: वनतारा और 'राधा कृष्ण मंदिर हाथी कल्याण ट्रस्ट' को 2019 से दी गई सभी अनुमतियों और मान्यताओं का पूरा रिकॉर्ड पेश किया जाए।

  • लाइसेंस पर सवाल: आयात और निर्यात (Import/Export) लाइसेंस से संबंधित दस्तावेजों की सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष समीक्षा की जाए।

  • नियमों का उल्लंघन: याचिकाकर्ता का आरोप था कि लुप्तप्राय प्रजातियों के रखरखाव में अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव मानदंडों की अनदेखी की जा रही है।

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पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए दोहराया कि:

  1. पिछली क्लीन चिट: पिछले साल भी इसी तरह की एक याचिका खारिज की गई थी। तब अदालत ने माना था कि 'कानून का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।'

  2. विशेष जांच टीम (SIT) की रिपोर्ट: उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जे. चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली SIT ने पहले ही वनतारा को क्लीन चिट दे दी थी, जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया था।

  3. मुद्दे का समाधान: अदालत ने कहा कि जब एक बार विशेषज्ञों की समिति और न्यायालय ने मामले की जांच कर ली है, तो दोबारा उसी मुद्दे को उठाने का कोई आधार नहीं बनता।

क्या है 'वनतारा'?

जामनगर (गुजरात) में स्थित वनतारा दुनिया के सबसे बड़े वन्यजीव पुनर्वास और संरक्षण केंद्रों में से एक है। यह विशेष रूप से हाथियों और अन्य लुप्तप्राय प्रजातियों के बचाव और उनके उपचार के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है। रिलायंस इंडस्ट्रीज द्वारा समर्थित इस प्रोजेक्ट को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है, हालांकि कुछ पर्यावरण समूहों ने इसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे।

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