भारत का 'परमाणु पुनर्जागरण': 2047 तक 100 GW बिजली का लक्ष्य; राजदूत विनय क्वात्रा ने अमेरिका के साथ 'शांति' समझौते पर की बड़ी चर्चा
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भारत का 'परमाणु पुनर्जागरण': 2047 तक 100 GW बिजली का लक्ष्य; राजदूत विनय क्वात्रा ने अमेरिका के साथ 'शांति' समझौते पर की बड़ी चर्चा

12, 2, 2026

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वाशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा ने नागरिक परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत-अमेरिका सहयोग के एक नए युग की घोषणा की है। वाशिंगटन में भारतीय दूतावास और परमाणु ऊर्जा संस्थान (NEI) द्वारा आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में क्वात्रा ने स्पष्ट किया कि भारत अब परमाणु ऊर्जा को अपनी 'क्लीन एनर्जी' रणनीति के केंद्र में रख रहा है। इस दौरान अमेरिका के ऊर्जा और विदेश विभाग के शीर्ष अधिकारी भी मौजूद रहे, जो इस साझेदारी की गंभीरता को दर्शाता है।

प्रमुख बिंदु और रणनीतिक बदलाव:

  • 'शांति' अधिनियम (SHANTI Act): एक नई शुरुआत: भारत सरकार ने दशकों पुराने परमाणु ऊर्जा अधिनियम (1962) और नागरिक दायित्व अधिनियम (2010) को निरस्त कर दिया है। 'शांति' अधिनियम अब भारत का सबसे व्यापक परमाणु सुधार है, जो निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए कानूनी बाधाओं को दूर करता है।

  • 100 गीगावाट का महत्वाकांक्षी लक्ष्य: भारत वर्तमान में केवल 8.8 GW परमाणु ऊर्जा पैदा करता है। सरकार का लक्ष्य 2047 तक इसे 11 गुना बढ़ाकर 100 GW तक ले जाना है। यह लक्ष्य भारत को न केवल ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाएगा, बल्कि 'नेट जीरो' (Net Zero) उत्सर्जन के लक्ष्य को पाने में भी मदद करेगा।

  • निजी क्षेत्र के लिए खुले द्वार: अब तक परमाणु ऊर्जा पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में थी, लेकिन नए सुधारों के बाद अब निजी कंपनियां और अंतरराष्ट्रीय निवेशक (जैसे अमेरिका की वेस्टिंगहाउस या जनरल इलेक्ट्रिक) भारतीय बाजार में सक्रिय रूप से उतर सकेंगे।

  • ऊर्जा सुरक्षा और बेसलोड बिजली: सौर और पवन ऊर्जा के साथ समस्या यह है कि वे स्थिर नहीं रहतीं। परमाणु ऊर्जा 'बेसलोड बिजली' (Base-load Power) प्रदान करती है, जो 24x7 स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित कर सकती है, जिससे उद्योगों को निर्बाध बिजली मिलेगी।

    वैश्विक प्रभाव:

    अमेरिका के साथ यह सहयोग केवल तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चीन और रूस के परमाणु प्रभुत्व के मुकाबले एक नया लोकतांत्रिक विकल्प पेश करता है। भारत-अमेरिका परमाणु सौदे (2008) के बाद यह इस दिशा में सबसे बड़ा व्यावहारिक कदम माना जा रहा है।

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