ईरान युद्ध के लिए $200 अरब का 'भारी बिल': पेंटागन ने व्हाइट हाउस से मांगी अतिरिक्त धनराशि; 'टैक्स कट' के बाद अब नए बजट पर रार
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ईरान युद्ध के लिए $200 अरब का 'भारी बिल': पेंटागन ने व्हाइट हाउस से मांगी अतिरिक्त धनराशि; 'टैक्स कट' के बाद अब नए बजट पर रार

12, 2, 2026

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वाशिंगटन: ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष के बीच पेंटागन ने अमेरिकी प्रशासन से $200 अरब (करीब ₹16.6 लाख करोड़) की अतिरिक्त वित्तीय सहायता की मांग की है। यह अनुरोध ऐसे समय में आया है जब रक्षा विभाग को पिछले साल राष्ट्रपति ट्रंप के टैक्स कटौती और व्यय विधेयक के तहत पहले ही $150 अरब का अतिरिक्त कोष मिल चुका है। पेंटागन के अनुसार, युद्ध की वर्तमान तीव्रता और गोला-बारूद के तेजी से खत्म होते भंडार को देखते हुए यह राशि बेहद जरूरी है।

मुख्य विवरण और राजनीतिक समीकरण:

  • 'इतनी बड़ी मांग क्यों?': रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने इस आंकड़े की सीधे तौर पर पुष्टि तो नहीं की, लेकिन एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "बुरे लोगों को मारने के लिए पैसे लगते हैं।" अधिकारियों के अनुसार, युद्ध के पहले छह दिनों में ही अमेरिका ने हथियारों और तैनाती पर $11.3 अरब खर्च कर दिए हैं, जो अनुमान से कहीं अधिक है।

  • कांग्रेस में विरोध के सुर: डेमोक्रेट्स और कुछ राजकोषीय रूढ़िवादी रिपब्लिकन इस मांग पर सवाल उठा रहे हैं। सीनेटर क्रिस वान होलेन ने इसे "पूरी तरह से अस्वीकार्य" बताया है। विपक्ष का तर्क है कि जब देश का कर्ज $39 ट्रिलियन के पार पहुँच चुका है, तो बिना कांग्रेस की अनुमति के शुरू हुए इस युद्ध के लिए 'ब्लैंक चेक' नहीं दिया जा सकता।

  • ट्रंप की चुनौती: राष्ट्रपति ट्रंप के लिए यह एक कूटनीतिक और राजनीतिक संकट बन सकता है। एक तरफ वे सरकारी खर्चों में कटौती के लिए 'एलोन मस्क' के दक्षता विभाग (DOGE) को बढ़ावा दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ रक्षा विभाग द्वारा एक और 'फोरेवर वार' (सदा चलने वाला युद्ध) के लिए खरबों डॉलर की मांग उनके 'अमेरिका फर्स्ट' वादों के विपरीत दिख रही है।

  • सैन्य तैयारी: यदि यह फंड मंजूर होता है, तो इसका बड़ा हिस्सा THAAD और पैट्रियट मिसाइल रक्षा प्रणालियों की तैनाती, विमानवाहक पोतों के संचालन और बमों के स्टॉक को फिर से भरने में खर्च किया जाएगा।

बाजार पर असर:

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिकी कांग्रेस इस फंड को मंजूरी देने में देरी करती है, तो इससे युद्ध के लंबा खिंचने का डर बढ़ेगा, जिससे वैश्विक तेल बाजारों में अस्थिरता बनी रह सकती है।

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