एटा की 'विवादित' जैन प्रतिमा जाएगी प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला; 11 अप्रैल तक संग्रहालय को सौंपने का आदेश
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एटा की 'विवादित' जैन प्रतिमा जाएगी प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला; 11 अप्रैल तक संग्रहालय को सौंपने का आदेश

12, 2, 2026

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प्रयागराज/एटा: उत्तर प्रदेश के एटा जिले में पानी की टंकी की खुदाई के दौरान मिली करीब 1000 साल पुरानी दुर्लभ जैन प्रतिमा अब प्रयागराज स्थित इलाहाबाद संग्रहालय की शान बनेगी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदायों के बीच मालिकाना हक के विवाद को देखते हुए, इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षा और गहन अध्ययन के लिए संग्रहालय में रखा जाए।

प्रमुख बिंदु और कानूनी निर्देश:

  • प्रतिमा का ऐतिहासिक महत्व: प्रारंभिक जांच में यह प्रतिमा 9वीं से 10वीं शताब्दी (कुछ रिपोर्टों के अनुसार 11वीं सदी) की मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की प्रतिमा हो सकती है।

  • सांप्रदायिक विवाद का समाधान: प्रतिमा के मिलने के बाद से ही जैन समुदाय के दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदायों ने इस पर अपना-अपना दावा पेश किया था। कोर्ट ने संवेदनशीलता को देखते हुए इसे किसी भी पक्ष को सौंपने के बजाय संग्रहालय में सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रखने का निर्देश दिया है।

  • विशेषज्ञ समिति का गठन: न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की पीठ ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के साथ मिलकर एक एक्सपर्ट टीम बनाने को कहा है। यह टीम 3 महीने के भीतर रिपोर्ट देगी कि प्रतिमा की बनावट (Iconography) किस संप्रदाय से मेल खाती है।

  • समय सीमा: एटा के जिलाधिकारी को निर्देश दिया गया है कि 11 अप्रैल, 2026 तक हर हाल में प्रतिमा को प्रयागराज संग्रहालय के प्रभारी को सौंप दिया जाए।

प्रतिमा की पहचान के आधार:

विशेषज्ञ इस बात की जांच करेंगे कि प्रतिमा दिगंबर परंपरा के अनुसार पूरी तरह नग्न और ध्यान मुद्रा में है, या श्वेतांबर परंपरा के अनुसार इस पर वस्त्र, आभूषण या आंखों की विशेष बनावट के निशान हैं। एटा के रिजोर गांव में मिली यह प्रतिमा उस क्षेत्र के समृद्ध जैन इतिहास का जीता-जागता प्रमाण है।

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