बाबा सिद्दीकी हत्याकांड: आरोपी आकाशदीप सिंह की जमानत बरकरार; सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार, महाराष्ट्र सरकार को लगाई फटकार
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बाबा सिद्दीकी हत्याकांड: आरोपी आकाशदीप सिंह की जमानत बरकरार; सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार, महाराष्ट्र सरकार को लगाई फटकार

12, 2, 2026

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नई दिल्ली: राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के कद्दावर नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या के मामले में गिरफ्तार आकाशदीप करज सिंह (22) को बड़ी राहत मिली है। उच्चतम न्यायालय ने उनकी जमानत रद्द करने की याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति जे. बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया आरोपी की इस अपराध में सीधी संलिप्तता के पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं।

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां और तर्क:

  • उच्च न्यायालय का फैसला सही: पीठ ने कहा कि बंबई उच्च न्यायालय ने 9 फरवरी को जो आदेश पारित किया था, वह रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को गहनता से देखने के बाद लिया गया 'सोच-विचार' वाला फैसला है। अदालत ने माना कि फिलहाल सिंह का हत्या से सीधा संबंध साबित नहीं हो रहा है।

  • लॉरेंस बिश्नोई गिरोह से संबंध: याचिकाकर्ता (बाबा सिद्दीकी की पत्नी शहजीन) की ओर से वरिष्ठ वकील नित्या रामकृष्णन ने तर्क दिया कि सिंह के तार बिश्नोई गिरोह से जुड़े हैं, जिसने हत्या की साजिश रची थी। हालांकि, अदालत ने इन आरोपों को जमानत रद्द करने के लिए अपर्याप्त पाया।

  • महाराष्ट्र सरकार पर तंज: जब राज्य सरकार के वकील ने जमानत को चुनौती देने की बात कही, तो सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, "जब मृतक की पत्नी हमारे सामने आई, तब राज्य सरकार भी नींद से जाग गई है।" यह टिप्पणी सरकार की देरी से की गई कार्रवाई पर सवाल उठाती है।

  • जमानत की शर्तें: पंजाब निवासी आकाशदीप सिंह को 1 लाख रुपये की जमानत पर रिहा किया गया है। शर्त यह है कि जब तक मुकदमा पूरा नहीं हो जाता, वह मुंबई से बाहर नहीं जा सकेगा।

मामले की पृष्ठभूमि: बाबा सिद्दीकी हत्याकांड (2024)

  • दिनांक: 12 अक्टूबर 2024 की रात।

  • स्थान: बांद्रा ईस्ट, मुंबई (बेटे जीशान सिद्दीकी के कार्यालय के बाहर)।

  • आरोप: अनमोल बिश्नोई द्वारा गिरोह का वर्चस्व बढ़ाने के लिए रची गई साजिश।

  • गिरफ्तारियां: अब तक 26 लोगों को पकड़ा गया है, जिन पर मकोका (MCOCA) के तहत मामला दर्ज है। आकाशदीप सिंह जमानत पाने वाला इस केस का पहला आरोपी है।


निष्कर्ष:

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख दर्शाता है कि संगठित अपराध के गंभीर मामलों में भी 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' और 'साक्ष्यों की उपलब्धता' के बीच संतुलन बनाना न्यायपालिका की प्राथमिकता है। पीड़ित परिवार के लिए यह फैसला निराशाजनक हो सकता है, लेकिन कानूनी रूप से यह जांच एजेंसी (पुलिस) पर दबाव बढ़ाता है कि वह पुख्ता सबूत पेश करे।

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