उत्तर भारत में पराली संकट का समाधान: पंजाब और हरियाणा में घटनाओं में 90% की ऐतिहासिक कमी; संसद में सरकार का जवाब
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उत्तर भारत में पराली संकट का समाधान: पंजाब और हरियाणा में घटनाओं में 90% की ऐतिहासिक कमी; संसद में सरकार का जवाब

12, 2, 2026

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नयी दिल्ली: केंद्र सरकार ने लोकसभा में जानकारी दी कि वर्ष 2022 की तुलना में वर्ष 2025 के धान कटाई सीजन के दौरान पराली जलाने के मामलों में भारी कमी आई है। यह डेटा दर्शाता है कि केंद्र और राज्य सरकारों के समन्वित प्रयासों और किसानों की जागरूकता का सकारात्मक असर धरातल पर दिखने लगा है।

संसद में पेश की गई रिपोर्ट की मुख्य बातें:

  • ऐतिहासिक गिरावट: पंजाब और हरियाणा, जो पराली जलाने के मुख्य केंद्र रहे हैं, वहां 2022 के मुकाबले पिछले साल (2025) घटनाओं में 90% से अधिक की कमी आई है।

  • वायु गुणवत्ता (AQI) पर प्रभाव: मंत्री ने स्वीकार किया कि सर्दियों में अगली फसल की बुवाई के लिए पराली जलाना उत्तर भारत के वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण रहा है, लेकिन अब इसमें सुधार हो रहा है।

  • नियमित निगरानी: दिल्ली-एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की नियमित समीक्षा की जा रही है।

  • समन्वित प्रयास: इस सफलता का श्रेय केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और किसानों के बीच बेहतर समन्वय, मशीनीकरण और बायो-डीकंपोजर के उपयोग को दिया गया है।

इस भारी गिरावट के 3 प्रमुख संभावित कारण:

  1. मशीनीकरण (In-situ Management): 'हैप्पी सीडर' और 'सुपर सीडर' जैसी मशीनों पर दी गई भारी सब्सिडी ने किसानों को पराली जलाने के बजाय उसे जमीन में ही मिलाने के लिए प्रेरित किया है।

  2. बायो-डीकंपोजर तकनीक: पूसा बायो-डीकंपोजर के छिड़काव से पराली को खाद में बदलने की प्रक्रिया तेज और सस्ती हुई है।

  3. पराली का व्यावसायिक उपयोग (Ex-situ Management): अब पराली का उपयोग बिजली संयंत्रों (Power Plants), जैव-ईंधन (Bio-fuel) और कागज़ उद्योगों में कच्चे माल के रूप में हो रहा है, जिससे किसानों को पराली बेचने पर अतिरिक्त आय हो रही है।


निष्कर्ष:

90% की यह कमी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव है। हालांकि, चुनौती अब इस स्तर को बनाए रखने और शेष 10% घटनाओं को भी शून्य पर लाने की है, ताकि दिल्ली और उत्तर भारत के नागरिकों को 'स्मॉग' (Smog) मुक्त सर्दियां मिल सकें।

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