कर्नाटक विधानसभा: मुख्यमंत्री की मंत्रियों को चेतावनी; "सवालों के जवाब न देना सदन की गरिमा को ठेस पहुँचाना है"
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कर्नाटक विधानसभा: मुख्यमंत्री की मंत्रियों को चेतावनी; "सवालों के जवाब न देना सदन की गरिमा को ठेस पहुँचाना है"

12, 2, 2026

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बेंगलुरु (17 मार्च 2026): मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने सोमवार को सभी मंत्रियों को एक कड़ा पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विधायकों के सवालों की अनदेखी करना न केवल संसदीय परंपराओं का उल्लंघन है, बल्कि इससे सरकार की छवि भी धूमिल हुई है।

मुख्यमंत्री के पत्र के मुख्य बिंदु:

  • आंकड़ों की हकीकत: 16वीं विधानसभा (2023-26) के दौरान पूछे गए 245 प्रश्नों में से केवल 90 के उत्तर दिए गए हैं। यानी आधे से अधिक (150+) सवाल अभी भी लंबित हैं।

  • अधिकारियों पर निशाना: मुख्यमंत्री ने मंत्रियों को निर्देश दिया है कि वे अपने विभागों और संबंधित अधिकारियों को तुरंत 'सुधारात्मक कार्रवाई' के लिए आदेश दें।

  • विधायकों के अधिकार: सिद्धरमैया ने कहा कि जब सरकार जवाब नहीं देती, तो विधायकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन होता है और वे सदन की कार्यवाही में प्रभावी ढंग से भाग नहीं ले पाते।


विधानसभा में अभूतपूर्व घटना: अध्यक्ष का 'वॉकआउट'

यह पत्र उस नाटकीय घटनाक्रम के बाद आया है, जिसने कर्नाटक संसदीय इतिहास में सबको चौंका दिया:

  1. अध्यक्ष की नाराजगी: विधानसभा अध्यक्ष यू.टी. खादर सरकारी विभागों द्वारा दिए गए 'अधूरे और अपर्याप्त' जवाबों से इतने आहत हुए कि उन्होंने सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी और विरोध स्वरूप सदन से बाहर चले गए।

  2. विपक्ष का हमला: भाजपा और जद(एस) के नेतृत्व वाले विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार अध्यक्ष की बार-बार दी गई चेतावनियों को जानबूझकर नजरअंदाज कर रही है।

  3. संवैधानिक गरिमा: किसी अध्यक्ष का सरकार के रवैये से परेशान होकर सदन छोड़ना यह दर्शाता है कि कार्यपालिका (Executive) और विधायिका (Legislature) के बीच तनाव चरम पर है।


निष्कर्ष:

सिद्धरमैया एक अनुभवी संसदीय नेता हैं और वे जानते हैं कि सदन में अनुत्तरित प्रश्न सरकार की कमजोरी का प्रतीक माने जाते हैं। उनका यह पत्र मंत्रियों के लिए एक 'अंतिम चेतावनी' की तरह है। यदि अब भी सुधार नहीं होता, तो विपक्ष को आगामी बजट सत्र या अन्य विधायी कार्यों में सरकार को घेरने का बड़ा हथियार मिल जाएगा।

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