सुप्रीम कोर्ट में 'उद्योग' की परिभाषा पर महामंथन: 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने शुरू की ऐतिहासिक सुनवाई
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सुप्रीम कोर्ट में 'उद्योग' की परिभाषा पर महामंथन: 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने शुरू की ऐतिहासिक सुनवाई

12, 2, 2026

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नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत 'उद्योग' (Industry) शब्द के दायरे को फिर से परिभाषित करने के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई शुरू कर दी है। इस मामले का सीधा असर देश के लाखों सरकारी कर्मचारियों, सामाजिक कल्याण योजनाओं और औद्योगिक संस्थानों पर पड़ेगा।

मामले का मुख्य केंद्र:

इस सुनवाई का मुख्य उद्देश्य 1978 के बेंगलुरु जलापूर्ति बनाम ए. राजप्पा मामले में जस्टिस वी. कृष्ण अय्यर द्वारा दिए गए उस फैसले की समीक्षा करना है, जिसने 'उद्योग' की परिभाषा को बहुत व्यापक बना दिया था। उस समय तय किया गया था कि जहाँ भी मालिक और कर्मचारी का संबंध है, वह 'उद्योग' की श्रेणी में आएगा।

9 न्यायाधीशों की पीठ के सामने मुख्य सवाल:

  • ट्रिपल टेस्ट की वैधता: क्या 1978 में निर्धारित 'ट्रिपल टेस्ट' (व्यवस्थित गतिविधि, सहयोग और सेवाओं का उत्पादन) आज के दौर में भी प्रासंगिक है?

  • सरकारी कल्याणकारी योजनाएं: क्या सरकार द्वारा चलाई जा रही सामाजिक कल्याणकारी गतिविधियों को 'औद्योगिक गतिविधि' माना जा सकता है?

  • 1982 का संशोधन: कोर्ट इस पर भी विचार करेगा कि 1982 के संशोधन अधिनियम को प्रभावी ढंग से लागू क्यों नहीं किया गया और इसका वर्तमान कानून पर क्या प्रभाव है।

पीठ की संरचना और सुनवाई:

सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस पीठ में न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा समेत कुल 9 न्यायाधीश शामिल हैं। केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी अपनी दलीलें पेश कर रहे हैं। 2017 में 7-सदस्यीय पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे 9-सदस्यीय पीठ को सौंपा था।

महत्व: यदि 'उद्योग' की परिभाषा बदलती है, तो चैरिटेबल संस्थाओं, विश्वविद्यालयों और सरकारी विभागों में काम करने वाले कर्मचारियों के अधिकारों और औद्योगिक विवादों के निपटारे के तरीके पूरी तरह बदल सकते हैं।

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