राज्यसभा में उठी 'अंतिम संस्कार के वैज्ञानिक प्रबंधन' की मांग: सीमित भूमि के बीच ऊर्ध्वाधर कब्रिस्तान और डिजिटल मैपिंग का सुझाव
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राज्यसभा में उठी 'अंतिम संस्कार के वैज्ञानिक प्रबंधन' की मांग: सीमित भूमि के बीच ऊर्ध्वाधर कब्रिस्तान और डिजिटल मैपिंग का सुझाव

12, 2, 2026

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नयी दिल्ली: भारत में तेजी से बढ़ती आबादी और शहरीकरण के कारण अब अंतिम विदाई के लिए भी भूमि का संकट खड़ा होने लगा है। मंगलवार को राज्यसभा में भाजपा सांसद डॉ. अजित माधवराव गोपछड़े ने शून्यकाल के दौरान इस गंभीर विषय को उठाते हुए सरकार से एक 'राष्ट्रीय नीति' बनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सभी धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए हमें अंतिम संस्कार के आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना होगा।

प्रमुख चिंताएं और वैश्विक उदाहरण:

  • भूमि का संकट: डॉ. गोपछड़े ने तर्क दिया कि भूमि अब एक बहुमूल्य और सीमित संसाधन है। भविष्य में भूमि उपयोग और नगर नियोजन से जुड़े विवादों से बचने के लिए श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों का पारदर्शी प्रबंधन समय की मांग है।

  • विदेशी मॉडल का सुझाव: उन्होंने जापान और यूरोपीय देशों का उदाहरण देते हुए 'ऊर्ध्वाधर कब्रिस्तान' (Vertical Cemeteries) और पर्यावरण अनुकूल गैस या विद्युत शवदाह गृहों को बढ़ावा देने की बात कही।

  • सरल दफन प्रणाली: उन्होंने सऊदी अरब की 'बिना मकबरे वाली सरल दफन' परंपरा का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी पद्धतियां भारत में भी भूमि बचाने में सहायक हो सकती हैं।

सांसद द्वारा सुझाए गए 3 मुख्य समाधान:

  1. डिजिटल मैपिंग: सभी श्मशान स्थलों और कब्रिस्तानों की GIS (Geographical Information System) मैपिंग अनिवार्य की जाए ताकि भूमि का सटीक रिकॉर्ड उपलब्ध रहे।

  2. भूमि ऑडिट: पुराने रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति के अंतर को खत्म करने के लिए व्यापक 'लैंड ऑडिट' किया जाए और आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाए।

  3. वैज्ञानिक नीति: केंद्र सरकार एक ऐसी नीति तैयार करे जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाए बिना 'नवाचार और आधुनिक प्रणालियों' के माध्यम से भूमि का संरक्षण करे।

"यह किसी धर्म विशेष का मामला नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए संसाधन बचाने का एक गंभीर मुद्दा है। हमें अपनी परंपराओं के साथ विज्ञान का सामंजस्य बिठाना होगा।" — डॉ. अजित माधवराव गोपछड़े, सांसद

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