जयपुर के 'शहरी तेंदुओं' पर अब 24 घंटे नज़र: झालाना में पहली बार रेडियो कॉलर तकनीक का आगाज़, आबादी में घुसते ही मिलेगा अलर्ट
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जयपुर के 'शहरी तेंदुओं' पर अब 24 घंटे नज़र: झालाना में पहली बार रेडियो कॉलर तकनीक का आगाज़, आबादी में घुसते ही मिलेगा अलर्ट

12, 2, 2026

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जयपुर: राजस्थान का वन विभाग जयपुर शहर से सटे झालाना जंगल के तेंदुओं की निगरानी के लिए एक क्रांतिकारी कदम उठाने जा रहा है। रिहायशी इलाकों में तेंदुओं की बढ़ती आवाजाही और स्थानीय लोगों में व्याप्त दहशत को कम करने के लिए अब तेंदुओं को रेडियो कॉलर से लैस किया जाएगा। राजस्थान में तेंदुओं पर इस तरह का प्रयोग पहली बार किया जा रहा है।

कैसे काम करेगी यह तकनीक?

  • रियल-टाइम ट्रैकिंग: मुख्य वन्यजीव संरक्षक के. सी. अरुण प्रसाद के अनुसार, इन रेडियो कॉलर में GPS ट्रैकर लगा होगा, जो हर पल तेंदुए की लोकेशन का डेटा कंट्रोल रूम को भेजेगा।

  • अर्ली वार्निंग सिस्टम: जैसे ही कोई तेंदुआ जंगल की सीमा पार कर आबादी वाले क्षेत्र की ओर बढ़ेगा, विभाग के पास तुरंत अलर्ट पहुँच जाएगा। इससे समय रहते बचाव और भीड़ नियंत्रण की कार्रवाई की जा सकेगी।

  • हल्के और सुरक्षित कॉलर: बेंगलुरु से मंगवाए गए ये रेडियो कॉलर बाघों के मुकाबले काफी हल्के हैं, ताकि तेंदुओं को चलने-फिरने या शिकार करने में कोई परेशानी न हो।

झालाना की चुनौतियां और समाधान:

  • 30 से अधिक तेंदुए: झालाना रिजर्व में वर्तमान में 30 से ज्यादा तेंदुए हैं, लेकिन यह जंगल चारों ओर से घने रिहायशी इलाकों से घिरा है।

  • डेटा विश्लेषण: रेडियो कॉलर से मिलने वाले डेटा से यह समझने में मदद मिलेगी कि तेंदुए किन रास्तों से शहर में दाखिल होते हैं और उनका प्राकृतिक आवास (Home Range) कितना बड़ा है।

  • पायलट प्रोजेक्ट: शुरुआत में यह कॉलर उन तेंदुओं को पहनाए जाएंगे जो अक्सर रिहायशी इलाकों के करीब देखे जाते हैं। सफलता मिलने पर इसे अन्य क्षेत्रों में भी लागू किया जाएगा।

"हमारा उद्देश्य वन्यजीवों और इंसानों, दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। रेडियो कॉलर तकनीक से हमें तेंदुओं के व्यवहार को समझने और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने में बड़ी मदद मिलेगी।" — के. सी. अरुण प्रसाद, मुख्य वन्यजीव संरक्षक

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