ILBS में गरीबों के मुफ्त इलाज की 'सीमा' पर हाईकोर्ट सख्त: दिल्ली सरकार को नोटिस; 10% बेड और 25% ओपीडी के नियम को चुनौती
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ILBS में गरीबों के मुफ्त इलाज की 'सीमा' पर हाईकोर्ट सख्त: दिल्ली सरकार को नोटिस; 10% बेड और 25% ओपीडी के नियम को चुनौती

12, 2, 2026

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नयी दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने बुधवार को 'सोशल जस्टिस' नामक एनजीओ की याचिका पर सुनवाई की। याचिका में ILBS के उस हालिया फैसले को असंवैधानिक बताया गया है, जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के मरीजों के लिए मुफ्त इलाज को सीमित कर दिया गया है।

विवाद की मुख्य वजह:

ILBS प्रशासन ने एक नीति बनाई है जिसके तहत:

  • IPD (भर्ती मरीज): केवल 10% बिस्तर ही EWS श्रेणी के लिए आरक्षित होंगे।

  • OPD (बाहरी मरीज): केवल 25% मरीजों को ही मुफ्त परामर्श और उपचार मिलेगा।

याचिकाकर्ता के 3 प्रमुख तर्क:

  1. सार्वजनिक संस्थान का निजीकरण: अधिवक्ता सत्यकाम ने दलील दी कि ILBS एक सरकारी सहायता प्राप्त सार्वजनिक संस्थान है। इसे 'शुल्क-आधारित' (Fee-based) मॉडल पर चलने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिससे यह आम जनता की पहुँच से बाहर हो जाए।

  2. संवैधानिक उल्लंघन: याचिका में कहा गया है कि यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार) का उल्लंघन है। यह अमीरों और गरीबों के बीच इलाज में भेदभाव पैदा करता है।

  3. गंभीर बीमारियाँ: चूँकि ILBS लिवर कैंसर, हेपेटाइटिस और सिरोसिस जैसी जानलेवा बीमारियों का एकमात्र विशेषज्ञ सरकारी केंद्र है, इसलिए यहाँ कोटा सिस्टम लागू होने से गरीब मरीजों की जान को खतरा हो सकता है।

अदालत की कार्रवाई:

  • उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार और ILBS प्रबंधन को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है।

  • मामले की अगली सुनवाई 22 अप्रैल, 2026 के लिए निर्धारित की गई है।

ILBS का महत्व:

संस्थान की स्थापना दिल्ली सरकार द्वारा एक स्वायत्त संस्थान के रूप में की गई थी। यह न केवल भारत बल्कि दक्षिण एशिया में जिगर और पित्त संबंधी रोगों के उपचार के लिए सबसे उन्नत केंद्रों में से एक माना जाता है।

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