इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: जिस दिन पति ने दिया 'तलाक', उसी दिन से माना जाएगा प्रभावी; कोर्ट की मुहर सिर्फ एक पुष्टि
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: जिस दिन पति ने दिया 'तलाक', उसी दिन से माना जाएगा प्रभावी; कोर्ट की मुहर सिर्फ एक पुष्टि

12, 2, 2026

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प्रयागराज (2 अप्रैल 2026): न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की पीठ ने हुमैरा रियाज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य के मामले में सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश पारित किया।

1. क्या था पूरा विवाद? (Case Background)

  • तलाक की तारीख: याचिकाकर्ता महिला के पहले पति ने उसे 27 फरवरी 2005 को तलाक दिया था।

  • अदालती पुष्टि: दीवानी अदालत ने इस तलाक को 8 जनवरी 2013 को वैध घोषित किया।

  • दूसरी शादी: इस बीच, महिला ने मई 2012 में दूसरी शादी कर ली (अदालती आदेश आने से पहले, लेकिन तलाक मिलने के 7 साल बाद)।

  • विवाद: दूसरे पति ने गुजारा भत्ता देने से यह कहकर मना कर दिया कि 2012 में हुई शादी 'शून्य' (Void) थी, क्योंकि तब तक पहले पति से तलाक की कानूनी पुष्टि (2013 का आदेश) नहीं हुई थी।


2. हाईकोर्ट की मुख्य कानूनी टिप्पणियाँ:

न्यायालय ने पारिवारिक अदालत के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसमें महिला की दूसरी शादी को अवैध माना गया था। कोर्ट के तर्क निम्नलिखित हैं:

  • घोषणात्मक प्रकृति (Declarative Nature): हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मोहम्मदिया कानून में जब पति तलाक देता है, तो तलाक उसी क्षण से प्रभावी हो जाता है। बाद में अदालत द्वारा दिया गया आदेश केवल उस 'तलाकशुदा स्थिति' की पुष्टि करता है, उसे पैदा नहीं करता।

  • तारीख का महत्व: कोर्ट का आदेश निर्णय की तिथि (2013) से तलाक लागू नहीं करता, बल्कि वह मूल तिथि (2005) से ही प्रभावी माना जाता है।

  • दूसरी शादी की वैधता: चूंकि तलाक 2005 में हो चुका था और महिला ने इद्दत की अवधि पूरी करने के बाद 2012 में शादी की, इसलिए वह शादी मोहम्मदिया कानून के तहत पूरी तरह वैध है।

  • धारा 125 (गुजारा भत्ता): कोर्ट ने कहा कि महिला अपने दूसरे पति से गुजारा भत्ता (Maintenance) पाने की हकदार है।


3. फैसले का प्रभाव और निष्कर्ष:

बिंदुस्थिति (High Court के अनुसार)
तलाक कब से लागू?पति द्वारा घोषणा की मूल तिथि से।
कोर्ट के आदेश की भूमिका?केवल पहले से मौजूद स्थिति की घोषणा/पुष्टि करना।
दूसरी शादी का अधिकार?इद्दत की अवधि पूरी होने के बाद, भले ही कोर्ट केस लंबित हो।

निष्कर्ष:

यह फैसला उन महिलाओं के लिए बड़ी राहत है जो लंबे समय तक चलने वाले अदालती मामलों के कारण अपनी सामाजिक और वित्तीय स्थिति को लेकर अनिश्चितता में रहती थीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कानूनी प्रक्रियाओं की देरी किसी व्यक्ति के निजी जीवन के अधिकारों (जैसे पुनर्विवाह) को बाधित नहीं कर सकती।

मामले को अब नए सिरे से निर्णय लेने के लिए वापस प्रयागराज की पारिवारिक अदालत (Family Court) के पास भेज दिया गया है।

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