ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026: UN की चिंता और 'स्व-पहचान' पर छिड़ी कानूनी जंग
आज की ताजा खबर
LIVE

ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026: UN की चिंता और 'स्व-पहचान' पर छिड़ी कानूनी जंग

12, 2, 2026

13

image

नयी दिल्ली (2 अप्रैल 2026): राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 30 मार्च को इस विधेयक को मंजूरी दी थी, लेकिन इसके लागू होने से पहले ही इसकी वैधानिकता पर सवाल उठने लगे हैं।

1. संयुक्त राष्ट्र (UN) की मुख्य आपत्तियां:

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार ने 'X' पर जारी अपने बयान में भारत सरकार के इस कदम की आलोचना की है:

  • परामर्श का अभाव: UN ने खेद जताया कि इस विधेयक को हितधारकों (ट्रांसजेंडर समुदाय और नागरिक समाज) के साथ व्यापक विचार-विमर्श किए बिना "जल्दबाजी" में पारित किया गया।

  • स्व-पहचान बनाम चिकित्सा सत्यापन: UN के अनुसार, नया कानून 'स्व-परिकल्पित लैंगिक पहचान' (Self-perceived Gender Identity) के अधिकार को खत्म कर 'अनिवार्य चिकित्सा सत्यापन' (Mandatory Medical Verification) की प्रक्रिया थोपता है।

  • हाशिये पर जाने का खतरा: यह बदलाव निजता के अधिकार का उल्लंघन कर सकता है और इस समुदाय को समाज की मुख्यधारा से और दूर कर सकता है।


2. विधेयक के विवादित प्रावधान:

प्रावधानविवाद का कारण
प्राधिकरण का गठनयह तय करने के लिए एक सरकारी अथॉरिटी होगी कि कोई व्यक्ति ट्रांसजेंडर है या नहीं। (विपक्ष इसे अपमानजनक मान रहा है)।
सीमित परिभाषाविधेयक "ट्रांसजेंडर" शब्द को सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान तक सीमित करता है।
बाहरी समूहसमलैंगिक पुरुषों (Gay), समलैंगिक महिलाओं (Lesbian) और 'स्व-परिकल्पित पहचान' वालों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।
दंडात्मक कार्रवाईट्रांसजेंडर व्यक्तियों को शारीरिक क्षति पहुँचाने पर सजा के कड़े (क्रमिक) प्रावधान किए गए हैं।

3. सरकार बनाम विपक्ष का तर्क:

  • सरकार का पक्ष: केंद्र सरकार का तर्क है कि इस संशोधन का उद्देश्य उन विशिष्ट समूहों (जैसे हिजड़ा, किन्नर आदि) की सुरक्षा करना है जो गंभीर सामाजिक भेदभाव का सामना करते हैं। सरकार का कहना है कि 'यौन अभिविन्यास' (Sexual Orientation) और 'लैंगिक पहचान' (Gender Identity) दो अलग विषय हैं।

  • विपक्ष का रुख: विपक्षी सांसदों ने मांग की थी कि विधेयक को संसदीय स्थायी समिति के पास भेजा जाए। उनका आरोप है कि यह कानून सुप्रीम कोर्ट के 'नालसा' (NALSA) फैसले का उल्लंघन करता है, जिसमें स्व-पहचान को मौलिक अधिकार माना गया था।


4. भविष्य की स्थिति:

कानून मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, यह कानून उस तारीख से प्रभावी होगा जिसे केंद्र सरकार राजपत्र (Gazette) में अधिसूचित करेगी। हालांकि, UN की टिप्पणी और घरेलू विरोध को देखते हुए संभावना है कि इस कानून को जल्द ही उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में चुनौती दी जा सकती है।


निष्कर्ष:

भारत अब तक एलजीबीटीक्यू+ (LGBTQ+) अधिकारों के मामले में दक्षिण एशिया में अग्रणी रहा है, लेकिन यह नया संशोधन 'स्व-पहचान' के वैश्विक मानकों और घरेलू न्यायिक मिसालों के बीच एक नया टकराव पैदा कर रहा है। सुरक्षा और पहचान के बीच का यह संतुलन आने वाले समय में एक बड़ी कानूनी बहस का केंद्र होगा।

Powered by Froala Editor