राहुल गांधी का पीएम को पत्र: 2 अप्रैल 2018 के आंदोलन के मुकदमों को रद्द करने की मांग
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राहुल गांधी का पीएम को पत्र: 2 अप्रैल 2018 के आंदोलन के मुकदमों को रद्द करने की मांग

12, 2, 2026

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नयी दिल्ली (2 अप्रैल 2026): राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि सरकार उन दलित और आदिवासी युवाओं के प्रति सहानुभूति दिखाए, जिन्होंने अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया था।

1. पत्र की मुख्य मांगें और तर्क:

  • मामलों की वापसी: राहुल गांधी ने अनुरोध किया कि 2 अप्रैल 2018 के देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के दौरान दर्ज सभी एफआईआर (FIR) की समीक्षा की जाए और उन्हें रद्द किया जाए।

  • भविष्य पर संकट: उन्होंने चिंता जताई कि इनमें से कई युवा अपने परिवार के 'पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी' (First-generation learners) हैं। लंबित आपराधिक मामलों के कारण उनकी शिक्षा, सरकारी नौकरी और करियर की संभावनाएं खत्म हो रही हैं।

  • नैतिक आधार: पत्र में याद दिलाया गया कि जिस मांग के लिए ये युवा सड़कों पर उतरे थे, संसद ने बाद में उसे स्वीकार कर SC-ST (संशोधन) अधिनियम, 2018 पारित किया। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2020 में इस कानून की बहाली को सही ठहराया।


2. ऐतिहासिक संदर्भ: 2 अप्रैल 2018 का आंदोलन क्यों हुआ था?

  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला: मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में SC-ST एक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी और प्रारंभिक जांच को अनिवार्य किया था।

  • देशव्यापी आक्रोश: दलित और आदिवासी संगठनों का मानना था कि इससे कानून कमजोर होगा। इसके विरोध में 2 अप्रैल 2018 को 'भारत बंद' का आह्वान किया गया।

  • त्रासदी: इस आंदोलन के दौरान हुई हिंसा में 14 दलित युवाओं की दुखद मृत्यु हो गई थी और हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया था।


3. राहुल गांधी के पत्र के मुख्य उद्धरण (Quotes):

"यह एक ऐसा कानून है जिसने लाखों दलितों और आदिवासियों को व्यवस्थागत भेदभाव के खिलाफ न्याय पाने का अधिकार दिया है।"

"संसद द्वारा बाद में कानून की ताकत बहाल करना उन युवाओं के 'उचित कारण' (Just cause) की पुष्टि करता है जिसके लिए वे संगठित हुए थे।"


4. राजनीतिक मायने:

यह पत्र ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दल दलित और पिछड़ा वर्ग के मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति बना रहे हैं। राहुल गांधी द्वारा 'संवेदनशीलता' और 'शीघ्र समाधान' का आग्रह सीधे तौर पर वंचित वर्गों के बीच कांग्रेस की पकड़ मजबूत करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।


निष्कर्ष:

अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। यदि सरकार इन मामलों को वापस लेती है, तो यह हजारों दलित और आदिवासी परिवारों के लिए बड़ी राहत होगी। हालांकि, गृह मंत्रालय को यह तय करना होगा कि किन मामलों को 'शांतिपूर्ण प्रदर्शन' की श्रेणी में रखा जाए और किन में 'हिंसा' के गंभीर आरोप हैं।

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