संसद में 'जन विश्वास विधेयक' पर रार: विपक्ष ने बताया 'कॉरपोरेट परस्त', सत्ता पक्ष बोला- 'आजाद भारत का सबसे बड़ा सुधार'
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संसद में 'जन विश्वास विधेयक' पर रार: विपक्ष ने बताया 'कॉरपोरेट परस्त', सत्ता पक्ष बोला- 'आजाद भारत का सबसे बड़ा सुधार'

12, 2, 2026

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विपक्षी दलों ने विधेयक को दोबारा प्रवर समिति (Select Committee) भेजने की उठाई मांग

नयी दिल्ली (3 अप्रैल 2026): राज्यसभा में ‘जन विश्वास (उपबंधों का संशोधन) विधेयक, 2026’ पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। जहाँ सरकार इसे व्यापार सुगमता के लिए क्रांतिकारी कदम बता रही है, वहीं विपक्ष ने इसमें कई गंभीर खामियों का दावा करते हुए इसे वापस प्रवर समिति में भेजने की मांग की है।

खबर के मुख्य बिंदु:

  • विपक्ष का 'कॉरपोरेट' वाला आरोप: राजद सांसद मनोज झा ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि यह विधेयक पूरी तरह 'कॉरपोरेट परस्त' है। उन्होंने चिंता जताई कि फार्मा क्षेत्र में ढील देने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि प्रभावित हो सकती है, जैसा कि पहले WHO की शिकायतों में देखा गया है।

  • अधिकारियों की शक्ति पर सवाल: समाजवादी पार्टी के रामजीलाल सुमन ने तर्क दिया कि छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने से अधिकारियों की मनमानी और शक्तियां बढ़ेंगी, जिससे अपराधों पर लगाम लगने के बजाय उनमें वृद्धि हो सकती है।

  • फार्मा और नकली दवाएं: सदन में नकली दवाओं के कारोबार पर लगाम न कसने और कमजोर वर्गों के उत्पीड़न की आशंकाओं को लेकर भी विपक्षी सदस्यों ने सरकार को घेरा। आम आदमी पार्टी के अशोक कुमार मित्तल ने पुराने लंबित अपराधों के लिए स्पष्ट नीति की मांग की।

  • सत्ता पक्ष की दलील: भाजपा सांसद सुरेंद्र सिंह नागर ने इसे 'ग्राम स्वराज' और महात्मा गांधी की सोच वाला विधेयक बताया। उन्होंने कहा कि 1,000 से अधिक छोटे जुर्मों को अपराधमुक्त करना छोटे व्यापारियों और समाज के अंतिम व्यक्ति के हित में है।

  • प्रक्रिया में बदलाव, सजा में नहीं: तेदेपा (TDP) के मस्तान राव यादव ने स्पष्ट किया कि केवल प्रक्रिया बदली गई है, इसका मतलब यह नहीं है कि दोषियों को सजा से पूरी तरह छूट मिल जाएगी।

निष्कर्ष: भारी बहस और विरोध के बावजूद, सरकार का रुख स्पष्ट है कि विकसित भारत के निर्माण के लिए 'भरोसे की संस्कृति' (Culture of Trust) विकसित करना अनिवार्य है।

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