खेती में 'नैनो' क्रांति: भारत में पारंपरिक यूरिया की खपत 3% घिरी; नैनो यूरिया के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता में 15% का सुधार
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खेती में 'नैनो' क्रांति: भारत में पारंपरिक यूरिया की खपत 3% घिरी; नैनो यूरिया के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता में 15% का सुधार

12, 2, 2026

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नयी दिल्ली (4 अप्रैल 2026): भारत के कृषि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। उर्वरक मंत्रालय की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 के दौरान पारंपरिक दानेदार यूरिया की खपत में पहली बार गिरावट दर्ज की गई है। इसका मुख्य श्रेय इफको (IFFCO) के 'नैनो यूरिया' के बढ़ते उपयोग को दिया जा रहा है।

विस्तृत विश्लेषण:

  • मिट्टी का स्वास्थ्य: लगातार यूरिया के अत्यधिक उपयोग से खराब हो रही मिट्टी की सेहत अब सुधरने लगी है। नैनो यूरिया सीधे पौधों की पत्तियों द्वारा सोखा जाता है, जिससे जमीन में नाइट्रोजन का लीचिंग (Leaching) नहीं होता। एक ताज़ा अध्ययन के अनुसार, इससे गेहूं और धान की पैदावार में 8% की वृद्धि हुई है।

  • आर्थिक बचत: नैनो यूरिया की एक 500 मिली की बोतल एक बोरी यूरिया के बराबर काम करती है। इससे न केवल किसानों की लागत कम हुई है, बल्कि सरकार के उर्वरक सब्सिडी बिल में भी ₹12,000 करोड़ की बचत हुई है।

  • भविष्य का लक्ष्य: सरकार का लक्ष्य 2028 तक भारत को यूरिया आयात में 'शून्य' करना है। इसके लिए देश भर में 10 नए नैनो यूरिया प्लांट लगाए जा रहे हैं।

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