कभी था माओवाद का गढ़, आज हिंदी बनी वरदान; छत्तीसगढ़ के इस गांव में भाषा ने बदला भविष्य
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कभी था माओवाद का गढ़, आज हिंदी बनी वरदान; छत्तीसगढ़ के इस गांव में भाषा ने बदला भविष्य

11, 8, 2025

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छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले का गंगालूर क्षेत्र, जो कभी माओवादियों का गढ़ माना जाता था, अब शिक्षा और भाषा के माध्यम से बदलाव की ओर अग्रसर है। यहां के बच्चों के लिए हिंदी शिक्षा एक वरदान साबित हो रही है, जो उन्हें बाहरी दुनिया से जोड़ने का कार्य कर रही है।

शिक्षा का नया अध्याय

लगभग एक साल पहले गंगालूर के कावड़गांव में एक स्कूल खोला गया था, जहां अब हर सुबह बच्चों की चहक सुनाई देती है। मास्टरजी बच्चों को ककहरा पढ़ाते हैं और गोंडी में उसका अर्थ समझाते हैं, जिससे बच्चों को पढ़ाई में आसानी होती है।

भाषा की भूमिका

सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर के अबूझमाड़ क्षेत्र के 400 से अधिक गांवों में गोंडी, हल्बी, दोरली जैसी स्थानीय बोलियाँ संवाद का मुख्य आधार थीं। इस कारण बाहरी दुनिया से संपर्क में कठिनाई होती थी। अब हिंदी शिक्षा के माध्यम से बच्चों को बाहरी दुनिया से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

सामाजिक बदलाव

हिंदी शिक्षा से बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ा है और वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रहे हैं। यह बदलाव न केवल शिक्षा के क्षेत्र में, बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।

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