नयी दिल्ली (2 अप्रैल 2026): विपक्ष का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त निष्पक्ष रूप से कार्य नहीं कर रहे हैं और 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) प्रक्रिया के जरिए जानबूझकर मतदाताओं को चुनावी प्रक्रिया से बाहर किया जा रहा है।
1. नोटिस के मुख्य बिंदु (Charge Sheet of Opposition):
कार्यपालिका का हस्तक्षेप: विपक्षी सांसदों (लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63) का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं।
मताधिकार से वंचित करना: विपक्ष का दावा है कि SIR प्रक्रिया का दुरुपयोग कर बड़े पैमाने पर लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं।
नियुक्ति पर सवाल: ज्ञानेश कुमार की मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति की प्रक्रिया को भी चुनौती दी गई है।
देरी का मुद्दा: यह नोटिस 12 मार्च 2026 को सौंपा गया था, लेकिन 20 दिन बीत जाने के बाद भी संसद सचिवालयों से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
2. ऐतिहासिक संदर्भ (TMC द्वारा दिए गए उदाहरण):
डेरेक ओ’ब्रायन ने पिछले उदाहरणों का हवाला देते हुए बताया कि पहले ऐसे प्रस्तावों पर कितनी तेजी से कार्रवाई होती थी:
| वर्ष | मामला (न्यायाधीश/अधिकारी) | कार्रवाई की गति |
| 1991 | न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी | 12 मार्च को प्रस्ताव स्वीकार, उसी दिन जांच समिति गठित। |
| 2009 | न्यायमूर्ति सौमित्र सेन | 20 फरवरी को नोटिस, 27 फरवरी को स्वीकार। |
| 2009 | न्यायमूर्ति पीडी दिनाकरन | 14 दिसंबर को नोटिस, 17 दिसंबर को स्वीकार। |
| 2018 | न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा | 20 अप्रैल को नोटिस, 23 अप्रैल को (खारिज) फैसला। |
ओ’ब्रायन का तर्क है कि वर्तमान मामले में हफ्तों की चुप्पी यह दर्शाती है कि सरकार चर्चा से भाग रही है।
3. 'मैच फिक्सिंग' और 'संवैधानिक खंजर' का आरोप:
सांठगांठ: टीएमसी सांसद ने भाजपा और निर्वाचन आयोग के बीच "गुप्त सांठगांठ" का आरोप लगाया और इसे लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ बताया।
संसद का मखौल: उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह संसद की परंपराओं को खत्म कर रहे हैं।
ममता बनर्जी का मॉडल: ओ’ब्रायन ने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार को महिला सशक्तिकरण और लोकतांत्रिक मूल्यों पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री से सीख लेनी चाहिए।
निष्कर्ष और संवैधानिक स्थिति:
भारत के संविधान के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के समान ही कठिन है (महाभियोग जैसी प्रक्रिया)। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। चूंकि वर्तमान में लोकसभा और राज्यसभा सचिवालयों ने इस नोटिस पर कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया है, इसलिए यह मामला एक बड़े संवैधानिक गतिरोध की ओर बढ़ रहा है।
Powered by Froala Editor




