नई दिल्ली (2 अप्रैल 2026): सूचना आयुक्त पी.आर. रमेश ने स्पष्ट किया है कि भले ही शिकायतकर्ताओं की निजी जानकारी गुप्त रखी जाए, लेकिन इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी 'जनहित' का मामला है।
1. क्या है 'नाता प्रथा'? (राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की दृष्टि में):
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने जून 2024 में इसे 'सामाजिक बुराई' और 'अनैतिक' करार दिया था:
सौदा: इस प्रथा के तहत लड़कियों और महिलाओं को शादी के नाम पर स्टांप पेपर या अनौपचारिक समझौतों के माध्यम से 'बेचा' जाता है।
अवैधता: राजस्थान, एमपी, यूपी और गुजरात के कुछ समुदायों में प्रचलित इस प्रथा की कोई कानूनी मान्यता नहीं है।
मानवीय त्रासदी: आयोग ने एक हृदय विदारक उदाहरण दिया जहाँ एक पिता ने अपनी नाबालिग बेटी का 'नाता' पहले 2.5 लाख रुपये और फिर 32,000 रुपये में तय किया, जिसके परिणामस्वरूप तंग आकर लड़की ने जून 2020 में आत्महत्या कर ली।
2. केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) का आदेश:
एक आरटीआई (RTI) याचिका पर सुनवाई करते हुए आयोग ने निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:
संशोधित रिपोर्ट: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को वह रिपोर्ट सार्वजनिक करनी होगी जो उसने मानवाधिकार आयोग को सौंपी है।
गोपनीयता: आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(जे) के तहत पीड़ितों और उनके परिवारों के व्यक्तिगत विवरणों को हटाकर (Masking) शेष रिपोर्ट साझा की जाएगी।
मंत्रालय का रुख: मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि यह प्रथा महिलाओं के लिए अत्यंत 'अपमानजनक' है और इसे जड़ से खत्म करना अनिवार्य है।
3. 'नाता प्रथा' के गंभीर परिणाम:
| पहलू | प्रभाव |
| मानवाधिकार उल्लंघन | महिलाओं को 'वस्तु' (Commodity) की तरह खरीदा और बेचा जाता है। |
| नाबालिगों पर संकट | कम उम्र की लड़कियों की जबरन शादी और शारीरिक-मानसिक शोषण। |
| कानूनी शून्यता | अनौपचारिक समझौतों के कारण पीड़ितों को पुलिस या अदालत से मदद मिलना कठिन होता है। |
| सामाजिक दबाव | कई मामलों में ग्रामीण पंचायतों या समुदायों की सहमति से यह सौदेबाजी होती है। |
4. प्रशासनिक सक्रियता:
नोटिस: मानवाधिकार आयोग ने संबंधित चार राज्यों (RJ, MP, UP, GJ) को नोटिस जारी कर 8 सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी।
जांच: सूचना आयोग के इस कदम से अब यह स्पष्ट हो सकेगा कि राज्यों ने इस प्रथा को रोकने के लिए वास्तव में क्या कानूनी कदम उठाए हैं या कितने दोषियों पर कार्रवाई की है।
निष्कर्ष:
'नाता प्रथा' जैसी मध्ययुगीन कुप्रथाएं आधुनिक भारत के माथे पर कलंक हैं। सूचना आयोग द्वारा कार्रवाई रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का आदेश पारदर्शिता लाएगा और सरकार पर इस दिशा में और अधिक ठोस कदम उठाने का दबाव बनाएगा। केवल कानूनी सख्ती ही नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों में सामाजिक जागरूकता अभियान चलाना भी समय की मांग है जहाँ इसे परंपरा का नाम देकर जायज ठहराया जाता है।
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